सीजी भास्कर, 30 जनवरी | Religious Controversy India : वाराणसी में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा की गई प्रेस वार्ता के बाद धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान दौर में गोमाता की रक्षा और गोहत्या पर रोक की मांग करना अपराध जैसा बना दिया गया है, जबकि यह सनातन परंपरा का मूल विषय है।
गोहत्या विरोध को बताया दबाया जा रहा आंदोलन
शंकराचार्य ने कहा कि इतिहास गवाह है, जब-जब समाज के किसी वर्ग ने गोहत्या बंद कराने की मांग उठाई, सत्ता ने उसे कुचलने का प्रयास किया। उनके अनुसार आज भी यही स्थिति है, जहां गो-रक्षा की बात करने वालों को योजनाबद्ध तरीके से निशाने पर लिया जा रहा है।
रामभद्राचार्य का नाम आने से बढ़ा विवाद
प्रेस वार्ता के दौरान अविमुक्तेश्वरानंद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ संत रामभद्राचार्य का नाम लेते हुए कहा कि एक घेरा बनाकर गोहत्या बंदी की मांग करने वालों पर हमले किए जा रहे हैं। इस बयान के बाद संत समाज के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
शंकराचार्य होने पर उठे सवाल
शंकराचार्य ने दावा किया कि प्रशासन की ओर से उनसे उनके शंकराचार्य होने का प्रमाण पत्र मांगा गया, जो धार्मिक परंपराओं के अपमान जैसा है। उन्होंने कहा कि धर्म किसी सरकारी दस्तावेज का मोहताज नहीं होता और यह सवाल उनकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य से उठाया गया।
‘हिंदू होने का प्रमाण’ वाला बयान
अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जब उनसे प्रमाण मांगा गया तो उन्होंने प्रस्तुत कर दिया, लेकिन अब सवाल यह है कि सत्ता में बैठे लोग अपने हिंदू होने का प्रमाण कैसे देंगे। उनके अनुसार हिंदू होना केवल वेशभूषा या भाषण नहीं, बल्कि गोसेवा और धर्म की रक्षा से जुड़ा आचरण है।
माघ मेले की घटना से शुरू हुआ विवाद
पूरा मामला 18 जनवरी से जुड़ा है, जब प्रयागराज माघ मेले में स्नान के लिए जा रहे शंकराचार्य की पालकी पुलिस ने रोक दी। शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की और शिखा पकड़कर घसीटने के आरोप लगे, जिसके बाद शंकराचार्य ने शिविर के बाहर धरना शुरू कर दिया और 11 दिनों तक शिविर में प्रवेश नहीं किया।
नोटिस, बयान और ‘कालनेमि’ विवाद
प्रशासन की ओर से दो नोटिस जारी कर शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा गया। इसी बीच मुख्यमंत्री द्वारा बिना नाम लिए दिए गए ‘कालनेमि’ वाले बयान ने विवाद को और गहरा कर दिया। जवाब में अविमुक्तेश्वरानंद ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया।
संत समाज में गहरी दरार
इस विवाद के बाद संत समाज दो खेमों में बंटता नजर आया। हालांकि तीनों शंकराचार्यों ने अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में अपनी बात रखी। शंकराचार्य की मांग थी कि प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी मांगे, तभी वह स्नान करेंगे।
इस्तीफों ने बढ़ाई सियासी हलचल
मामले के समर्थन और विरोध में प्रशासनिक हलकों में भी हलचल देखी गई। पहले समर्थन में एक अधिकारी ने पद छोड़ा, तो बाद में सत्ता के समर्थन में दूसरे अधिकारी के इस्तीफे ने पूरे घटनाक्रम को और चर्चा में ला दिया।
बिना स्नान माघ मेले से विदाई
28 जनवरी की सुबह शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अचानक माघ मेला छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि मन इतना व्यथित है कि बिना स्नान किए ही विदा ले रहे हैं। इस फैसले ने संत समाज और आम श्रद्धालुओं को चौंका दिया।




