सीजी भास्कर,10। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों और उनके परिजनों के हक में एक ऐतिहासिक फैसला (Road Accident Compensation) सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि बीमा कंपनियां अब केवल ‘समय सीमा’ (डेडलाइन) का हवाला देकर क्षतिपूर्ति के दावों को खारिज नहीं कर सकेंगी।
अक्सर देखा जाता है कि हादसे के बाद सदमे या अन्य कारणों से क्लेम करने में देरी होने पर कंपनियां तकनीकी पेच फंसाकर मुआवजा देने से इनकार कर देती थीं। हाई कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि तकनीकी बाधाओं के आधार पर पीड़ितों को न्याय के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
बीमा कंपनियों की दलीलों को कोर्ट ने किया दरकिनार
इस मामले में श्रीराम जनरल इंश्योरेंस, चोलामंडलम, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड और टाटा एआईजी जैसी कई नामी कंपनियों ने 40 से अधिक याचिकाएं दायर (Road Accident Compensation) की थीं। कंपनियों का तर्क था कि मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 166(3) के तहत निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद क्लेम ट्रिब्यूनल को सुनवाई का अधिकार नहीं है।
कंपनियों का जोर इस बात पर था कि देरी के कारण आवेदनों को रद्द कर दिया जाना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए मानवीय दृष्टिकोण और न्याय की प्राथमिकता को कानून की तकनीकी बारीकियों से ऊपर रखा।
ट्रिब्यूनल में जारी रहेगी सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर
हाई कोर्ट ने सभी मोटर दुर्घटना क्लेम ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि वे इन मामलों की सुनवाई कानून के अनुसार (Road Accident Compensation) जारी रखें। हालांकि, कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश यह भी दिया है कि चूंकि यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है,
इसलिए ट्रिब्यूनल तब तक कोई अंतिम आदेश पारित नहीं करेंगे जब तक शीर्ष अदालत का फैसला नहीं आ जाता। इस फैसले से उन हजारों परिवारों को संजीवनी मिली है, जो केवल आवेदन करने में हुई देरी की वजह से आर्थिक सहायता और न्याय के लिए सालों से भटक रहे थे।


