सीजी भास्कर, 21 अप्रैल : देश की सर्वोच्च अदालत (Sabarimala Case) में आज नौ जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले कथित भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई की जा रही है। यह सुनवाई वर्ष 2018 के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर हो रही है, जिसमें महिलाओं के प्रवेश, धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर गहन विचार-विमर्श किया जा रहा है।
आपको बता दें कि केरल स्थित सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Case) से जुड़े इस मामले के साथ-साथ अदालत अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी विचार कर रही है। इनमें अंतरधार्मिक विवाह के बाद पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर में प्रवेश का अधिकार, मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश का सवाल, धार्मिक बहिष्कार की प्रथाओं की वैधता तथा दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति जैसे संवेदनशील विषय भी शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान पीठ में शामिल जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया कि यदि किसी श्रद्धालु को केवल परंपरा या जन्म के आधार पर पूजा-अधिकार से वंचित किया जाता है, तो क्या संविधान उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या किसी व्यक्ति को देवता के दर्शन या स्पर्श से केवल धार्मिक मान्यताओं के आधार पर रोका जा सकता है।
इस पर मंदिर (Sabarimala Case) पक्ष के प्रमुख पुजारी ने दलील दी कि पूजा-पद्धति और धार्मिक अनुष्ठान किसी भी धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं और इन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब कोई भक्त मंदिर में आता है तो उसे वहां की परंपराओं और नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है।
संवैधानिक पीठ ने सुनवाई के पहले ही दिन सभी पक्षकारों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे निर्धारित समयसीमा के भीतर ही अपनी दलीलें प्रस्तुत करें। अदालत ने अतिरिक्त समय देने से भी इनकार कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई का पूरा कार्यक्रम पहले ही तय कर दिया है। इसके तहत 7 से 9 अप्रैल तक समर्थन में दलीलें, 14 से 16 अप्रैल तक विरोधी पक्ष की दलीलें सुनी गईं, जबकि 21 अप्रैल को जवाबी दलीलें और 22 अप्रैल तक अंतिम बहस पूरी होने की संभावना है।
यह मामला देश में धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं और महिलाओं के समान अधिकारों के बीच संतुलन तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।


