Social Harmony Movement : रायपुर के भैंसथान मैदान में मंगलवार को आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन ने पूरे परिसर को एक उत्सवी वातावरण में बदल दिया। हजारों लोगों की उपस्थिति ने यह साफ कर दिया कि समाज में समरसता और साथ चलने का भाव अब केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक संकल्प बन चुका है। हिन्दू जागरण समिति द्वारा आयोजित ये विशाल सम्मेलन कई स्तरीय गतिविधियों और आध्यात्मिक कार्यक्रमों की वजह से दिनभर चर्चाओं में रहा।
मुख्य वक्तव्य की धुरी—समरसता का व्यवहारिक मॉडल
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और सह सरकार्यवाह अतुल लिमये ने कहा कि वास्तविक सामाजिक परिवर्तन केवल बोलने से नहीं, प्रत्यक्ष आचरण से आता है।
उन्होंने ज़ोर दिया कि अगर समाज में व्याप्त भेदभाव को समाप्त करना है, तो हर व्यक्ति को अपने व्यवहार में समरसता को जीवन-मूल्य की तरह अपनाना होगा।
उन्होंने कहा कि भारत विकसित राष्ट्र की सीमा रेखा के बेहद करीब खड़ा है—अब जरूरी है कि हर नागरिक अपनी क्षमता और भागीदारी बढ़ाए।

परिवर्तन का शंखनाद
अतुल लिमये ने अपने वक्तव्य में बताया कि यह विराट हिन्दू सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक जागृति का संकेत है।
उन्होंने इतिहास का संदर्भ देते हुए कहा कि विदेशी आक्रमणों ने कभी भारत की सांस्कृतिक व्यवस्था को चोट पहुँचाई थी, लेकिन गुरु गोविंद सिंह, छत्रपति शिवाजी महाराज और (Hindavi Swaraj) जैसे संकल्पों ने इसे पुनर्जीवित किया।
“आज वही उत्साह फिर लौटता दिख रहा है,” उन्होंने कहा।
वैश्विक मंच पर भारत का प्रभाव और सांस्कृतिक पुनरुत्थान
लिमये ने आगे कहा कि कश्मीर घाटी में 90 से अधिक मंदिरों की पुनर्स्थापना, 171 देशों में योग का विस्तार और चंद्रयान जैसे अभियानों की सफलता यह बताती है कि भारत अब ‘अस्पिरेन्ट नेशन’ नहीं, बल्कि भविष्य का नेतृत्वकर्ता (Future Leadership) बनने की ओर बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि योग और हिंदुत्व के मूल विचार ‘सम-व्यवहार’ को आज विश्वभर में स्वीकारा जा रहा है।

वर्तमान चुनौतियाँ और उनका समाधान
उन्होंने छत्तीसगढ़ में वामपंथ और ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ को समाजिक स्थिरता के लिए चुनौती बताया और कहा कि मतांतरण एवं कट्टरपंथ (Radicalisation) के विरुद्ध समाज को अपनी क्षमता बढ़ानी होगी।
जातिगत भेदभाव के संदर्भ में उन्होंने कहा कि “अगर समाज को आगे ले जाना है, तो यह भाव पहले घर में और फिर समाज में समाप्त होना चाहिए।”
सांस्कृतिक प्रस्तुति—भाव, भक्ति और मंच का समन्वय
कार्यक्रम के सांस्कृतिक सत्र की शुरुआत गणेश वंदना से हुई। इसके बाद बुजुर्गों के जीवन की सच्चाई को दर्शाने वाला एक भावनात्मक नाट्य मंचन हुआ, जिसने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।
छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य, देशभक्ति गीतों पर प्रस्तुति और श्रीराम जन्मभूमि तथा श्रीकृष्ण लीला पर आधारित नृत्यों ने पूरे वातावरण को जीवंत कर दिया।

रुद्राक्ष अभिमंत्रण और सामूहिक हनुमान चालीसा
कार्यक्रम की प्रमुख विशेषता रुद्राक्ष अभिमंत्रण का अनुष्ठान रहा, जिसे मुख्य पुजारी हनुमंत लाल महाराज ने सम्पन्न कराया।
इसके बाद महिलाओं की अगुवाई में सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ हुआ, जिसकी ध्वनि पूरे परिसर में गूंज उठी।
इसके पश्चात अतिथियों ने गौ-पूजन और प्रदर्शनी का उद्घाटन किया, जिसमें संत-महापुरुषों की जीवन गाथाओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध था।
अतिथियों का संबोधन और सामाजिक आदर्शों पर जोर
कार्यक्रम में उपस्थित संत समुदाय ने समाज को एकजुटता, परिवार की शक्ति और भेदभाव-मुक्त व्यवहार की सीख दी।
मुख्य अतिथि श्रीरामसुंदर दास महाराज और संत वेदप्रकाश जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि हिन्दू समाज का सबसे बड़ा बल उसका ‘एक परिवार’ बनने का भाव है।
‘सोनी परिवार’ सम्मानित—संयुक्त परिवार का सजीव उदाहरण
सम्मेलन की एक खास बात वह सम्मान था जो वर्षों से संयुक्त रूप से रहने वाले “सोनी परिवार” को दिया गया।
आज के दौर में जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, वहीं यह परिवार प्रेरणा का स्रोत बना। कार्यक्रम में मौजूद हर व्यक्ति ने इसे विशेष रूप से सराहा।
अंतिम चरण—आरती, प्रसादी और समाज की उल्लेखनीय भागीदारी
कार्यक्रम का समापन भारत माता की आरती के साथ हुआ।
रामसागर पारा सहित आसपास के इलाकों से पहुंचे करीब 2,500 से अधिक लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया और अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
पूरे कार्यक्रम में मातृशक्ति की बड़ी भागीदारी विशेष रूप से दिखाई दी।
समिति और आयोजन से जुड़े प्रमुख नाम
स्वागत समिति:
प्रफुल्ल विश्वकर्मा, विजय अग्रवाल, रामलखन साहू, अमर बंसल, डॉ. मंतराम वर्मा
आयोजन समिति:
सुनील खंडेलवाल, मोहन साहू, जयप्रकाश फुटान, दीपीका सोनी, मोहन साहू (बॉस), विजय सोनी, सोनू सिंह राजपूत, कुंज बिहारी यादव, डॉ. मंजरी बक्षी, कुशल गेडेकर, दीपलक्ष्मी साहू, ममता साहू, हरीश फरीकार, राजेन्द्र शर्मा, रमेश शर्मा, संतोषी यादव, अर्चना झेरिया, पूनम सोनी






