सीजी भास्कर, 04 फरवरी | छत्तीसगढ़ में पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग की 14 साल पुरानी भर्तियों पर न्यायिक मुहर लग गई है। Sub Engineer Appointment Cancelled के फैसले में हाईकोर्ट ने 67 सब-इंजीनियर (सिविल) की नियुक्तियों को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया और साफ कहा—नियमों से बाहर की गई भर्ती स्वीकार्य नहीं है।
योग्यता की कट-ऑफ तारीख बदली नहीं जा सकती
डिवीजन बेंच ने दो टूक कहा कि विज्ञापन में तय शैक्षणिक योग्यता की अंतिम तारीख भर्ती की रीढ़ होती है। उसी तारीख तक डिग्री/डिप्लोमा होना अनिवार्य है; चयन तिथि को आधार बनाकर शर्तें ढीली नहीं की जा सकतीं। यही सिद्धांत Backdoor Recruitment Verdict का मूल है।
2011 की भर्ती: संख्या और शर्त—दोनों पर सवाल
मामले की जड़ 2011 की उस प्रक्रिया में है, जिसमें 275 पदों के विज्ञापन के बावजूद 383 नियुक्तियां कर दी गईं। जांच में 89 ऐसे अभ्यर्थी सामने आए, जिनके पास आवेदन की अंतिम तारीख तक आवश्यक योग्यता नहीं थी—यहीं से विवाद ने कानूनी रूप लिया।
याचिका से अपील तक: अदालत का रुख
भर्ती को चुनौती देने वाली याचिका पहले खारिज हुई, लेकिन अपील में डिवीजन बेंच ने रिकॉर्ड खंगाले। दस्तावेज़ों और समय-सीमा के उल्लंघन ने निर्णय की दिशा तय की, और अदालत ने प्रक्रिया की पवित्रता को सर्वोपरि रखा।
सरकार की दलीलें क्यों नहीं टिकीं
राज्य की ओर से यह तर्क रखा गया कि अंतिम सेमेस्टर के विद्यार्थियों को बाद में मौका देने का निर्णय लिया गया था और कर्मचारी वर्षों से सेवा दे रहे हैं। अदालत ने कहा—लंबी सेवा भी अवैध नियुक्ति को वैध नहीं बनाती; नियम बदलकर भर्ती नहीं चलाई जा सकती।
दो को राहत, 67 पर कार्रवाई
कोर्ट ने रिट ऑफ को-वारंटो जारी कर अधिकांश नियुक्तियां रद्द कीं। हालांकि, दो अभ्यर्थियों को राहत मिली क्योंकि उन्होंने कट-ऑफ तारीख से पहले योग्यता पूरी कर ली थी—यह अंतर दस्तावेज़ों से स्पष्ट था।
मानवीय दृष्टि: वेतन वसूली नहीं
फैसले में संतुलन भी दिखा। वर्षों की सेवा को देखते हुए अदालत ने अब तक दिए गए वेतन-भत्तों की वसूली से इनकार किया, लेकिन नियुक्तियों को अवैध मानते हुए समाप्त करने का आदेश बरकरार रखा।
प्रशासनिक चूक पर सख्त टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने चयन में देरी और नियमों के पालन में ढिलाई पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ऐसी प्रक्रियात्मक चूकें योग्य अभ्यर्थियों के अवसर छीनती हैं—यह सार्वजनिक सेवा के हित में नहीं है।
एफआईआर और समितियों की रिपोर्ट का संदर्भ
मामले में पहले एफआईआर दर्ज हो चुकी थी और जांच के दौरान कुछ अभ्यर्थियों ने पद छोड़े भी थे। गठित समितियों ने भी अनियमितताओं की पुष्टि की—इन तथ्यों ने निर्णय को और मजबूती दी।




