सीजी भास्कर, 09 फरवरी। बस्तर संभाग की सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय कला और परंपराओं को सहेजने के उद्देश्य से आयोजित बस्तर पंडुम 2026 का समापन ऐतिहासिक और भव्य (Sukma Tribal Drama) रूप में संपन्न हुआ। लालबाग मैदान, जगदलपुर में आयोजित इस संभाग स्तरीय आयोजन में सुकमा जिले के जनजातीय नाट्य दल ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति से सबका ध्यान खींचते हुए प्रथम पुरस्कार अपने नाम किया।
समापन समारोह में देश के केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai ने सुकमा के कलाकारों को स्मृति चिन्ह और 50 हजार रुपये का चेक प्रदान कर सम्मानित किया। मंच से कलाकारों के आत्मविश्वास और पारंपरिक कला के संरक्षण की सराहना की गई।
संस्कृति संरक्षण की मजबूत पहल
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में आयोजित इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य बस्तर की पारंपरिक नृत्य-नाट्य शैलियों, गीत-संगीत, खानपान, शिल्प और आंचलिक साहित्य को संरक्षित (Sukma Tribal Drama) करना और स्थानीय कलाकारों को राज्य व राष्ट्रीय स्तर का मंच देना रहा। इस पहल से विलुप्त होती लोक विधाओं को नई पहचान मिल रही है और जनजातीय समाज के सतत विकास की दिशा में ठोस कदम बढ़ रहे हैं।
सुकमा के कलाकारों का दमदार प्रदर्शन
कलेक्टर अमित कुमार के मार्गदर्शन और जिला सीईओ मुकुंद ठाकुर के कुशल प्रबंधन में सुकमा जिले से 12 विधाओं के 69 कलाकारों ने प्रतियोगिता में भाग लिया। नाट्य विधा में कोंटा विकासखंड के सुदूर ग्राम पंचायत कोंडासांवली के आश्रित गांव पारला गट्टा की टीम ने प्रथम स्थान हासिल कर जिले का नाम रोशन किया।
कला का जीवंत मंचन
मुड़िया जनजाति के 13 सदस्यीय दल (9 पुरुष और 4 महिलाएं) ने अपनी प्रस्तुति में ताड़ के पत्ते, मयूर पंख, तीर-धनुष और मछली पकड़ने के जाल जैसी दैनिक उपयोग की वस्तुओं का कलात्मक प्रयोग किया। पारंपरिक जीवनशैली के इस जीवंत चित्रण ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और निर्णायकों से भी खूब सराहना बटोरी।
इन कलाकारों ने बढ़ाया सुकमा का मान
कोंटा विकासखंड के पारला गट्टा निवासी कलाकार लेकम लक्का, प्रकाश सोड़ी, विनोद सोड़ी, जोगा सुदाम और उनकी पूरी टीम ने इस उपलब्धि से सुकमा जिले को गौरवान्वित (Sukma Tribal Drama) किया। इस सफलता में नोडल अधिकारी मनीराम मरकाम और पी. श्रीनिवास राव का भी अहम योगदान रहा, जिन्होंने कलाकारों को मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देकर संभाग स्तर तक पहुंचाया।
बस्तर पंडुम 2026 ने यह संदेश साफ कर दिया कि बस्तर की जनजातीय कला केवल परंपरा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सशक्त पहचान और गर्व का प्रतीक है।




