सीजी भास्कर, 29 मई। देश की न्याय व्यवस्था को लेकर एक अहम कदम उठाया (Supreme Court) गया है। लंबे समय से फैसलों में हो रही देरी को लेकर चर्चा के बीच सर्वोच्च अदालत ने ऐसा निर्देश जारी किया है, जिसने न्यायिक व्यवस्था में समयबद्ध प्रक्रिया की बहस को फिर तेज कर दिया है। कानूनी गलियारों से लेकर आम लोगों तक इस फैसले की चर्चा हो रही है।
न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हजारों मामलों के बीच आए इस आदेश को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालतों में लंबित निर्णयों को लेकर उठते सवालों के बीच अब समयसीमा तय करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। इससे उन लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है जो लंबे समय से फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
सभी उच्च न्यायालयों को जारी हुआ निर्देश : Supreme Court
जानकारी के मुताबिक भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने देश के सभी हाई कोर्ट के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। आदेश में कहा गया है कि सुरक्षित रखे गए लंबित फैसलों को तीन महीने के भीतर सुनाया जाए।
सर्वोच्च अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए यह आदेश जारी किया है। अदालत का मानना है कि समय पर न्याय मिलना न्याय व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
जमानत आदेशों पर भी स्पष्ट निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि जमानत से जुड़े मामलों में फैसला होने के दिन ही आदेश जारी किया जाए। यदि किसी कारण ऐसा संभव न हो तो अगले दिन तक आदेश उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
इसके साथ ही निचली अदालतों को भी निर्देश दिया गया है कि नियमित जमानत आदेशों की सूचना बिना देरी संबंधित पक्षों तक पहुंचाई जाए, ताकि प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी न हो।
चौबीस घंटे के भीतर वेबसाइट पर अपलोड होंगे फैसले
सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा है कि सुनाए गए सभी फैसलों को 24 घंटे के भीतर संबंधित हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड (Supreme Court) किया जाना चाहिए। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और पक्षकारों को फैसले तक समय पर पहुंच मिल सकेगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्णय के मुख्य भाग के उच्चारण की तारीख को ही फैसले की आधिकारिक तारीख माना जाएगा।
समय पर न्याय को बताया जरूरी
अपने आदेश में सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट देश की न्याय व्यवस्था की प्रमुख संस्थाएं हैं, जहां बड़ी संख्या में लोग न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। ऐसे में समय पर निर्णय सुनाना बेहद आवश्यक है।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जारी किए गए निर्देशों का उद्देश्य किसी न्यायाधीश या संस्था पर सवाल (Supreme Court) उठाना नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी तथा समयबद्ध बनाना है।




