सीजी भास्कर, 14 मार्च। सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने की मांग पर सुनवाई से इन्कार करते (Supreme Court Menstrual Leave) हुए साफ कहा कि ऐसी बाध्यकारी व्यवस्था का असर महिलाओं के रोजगार पर नकारात्मक पड़ सकता है। अदालत का कहना था कि अगर इसे कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया, तो कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं। पीठ ने माना कि यह मुद्दा महिलाओं के अधिकार और गरिमा से जुड़ा है, लेकिन इसके समाधान में सिर्फ भावनात्मक नहीं, व्यावहारिक पक्ष को भी देखना जरूरी है। अदालत ने संकेत दिया कि अच्छी मंशा से लाई गई नीति भी अगर संतुलित ढंग से न बने, तो उसका परिणाम महिलाओं के खिलाफ जा सकता है।
नीति बनाने का सवाल सरकार और संबंधित प्राधिकरण पर छोड़ा
शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीधा आदेश देने के बजाय केंद्र सरकार और सक्षम प्राधिकारियों से कहा है कि वे याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार करें और सभी संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद यह देखें कि मासिक धर्म अवकाश पर कोई उपयुक्त नीति बनाई जा सकती है या नहीं। अदालत ने साफ किया कि यह विषय व्यापक परामर्श, सामाजिक समझ और रोजगार बाजार की हकीकत को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए। यानी कोर्ट ने दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया, लेकिन फैसला अपने हाथ में लेने के बजाय इसे नीति-निर्माण के दायरे में रखा।
अदालत ने रोजगार बाजार की वास्तविकता पर जताई चिंता
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य करने का असर नियोक्ताओं की भर्ती नीति (Supreme Court Menstrual Leave) पर पड़ सकता है। अदालत की चिंता यह थी कि अगर महिलाओं के लिए अलग से सवेतन अवकाश को कानूनी बाध्यता बना दिया गया, तो निजी क्षेत्र के कुछ नियोक्ता उन्हें नियुक्त करने से हिचक सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह का प्रावधान अनजाने में उन लैंगिक धारणाओं को और मजबूत कर सकता है, जिनमें महिलाओं को कार्यस्थल पर कम सक्षम या अतिरिक्त बोझ वाली श्रेणी में देखा जाता है। अदालत ने इस पूरे सवाल को समानता, अवसर और रोजगार के संतुलन से जुड़ा हुआ माना।
राज्यों और निजी संस्थानों के मॉडल का भी हुआ जिक्र
सुनवाई के दौरान यह दलील भी रखी गई कि कुछ राज्यों और निजी संस्थानों में मासिक धर्म अवकाश जैसी व्यवस्था पहले से किसी न किसी रूप में मौजूद है। इस पर अदालत ने कहा कि अगर कोई संस्था स्वेच्छा से ऐसी सुविधा देती है, तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन इसे देशभर में अनिवार्य कानूनी शर्त बना देना अलग बात है। कोर्ट का संकेत साफ था कि स्वैच्छिक मॉडल और बाध्यकारी कानून, दोनों के असर अलग-अलग होते हैं। इसलिए एक व्यापक नीति बनाते समय इस फर्क को समझना जरूरी होगा।
कोर्ट ने बार-बार याचिका दायर करने पर भी टिप्पणी की
पीठ ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर याचिकाकर्ता पहले भी अदालत का दरवाजा खटखटा (Supreme Court Menstrual Leave) चुका है और अपनी बात संबंधित प्राधिकारियों के सामने रख चुका है। अदालत के अनुसार अब बार-बार कोर्ट आकर उसी मुद्दे पर सकारात्मक आदेश मांगना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने युवा महिलाओं के हित में जो मुद्दा उठाना था, वह उठा दिया है। अब आगे की जिम्मेदारी सरकार और संबंधित संस्थाओं की है कि वे इस पर संतुलित, व्यवहारिक और संवेदनशील नीति पर विचार करें।





