सीजी भास्कर, 02 जनवरी। देश की अर्थव्यवस्था एक ऐसे दौर (Tax Relief Middle Class) में खड़ी है, जहां उसकी असली ताकत आंकड़ों से ज्यादा लोगों की रोज़मर्रा की खपत में दिखाई देती है। भारत की GDP में करीब 60 फीसदी हिस्सेदारी घरेलू खपत की है और यही वजह है कि बजट 2026 को सिर्फ सरकारी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि आम परिवारों की उम्मीदों से जुड़ा फैसला माना जा रहा है। आने वाले बजट में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आम आदमी की जेब हल्की किए बिना विकास की रफ्तार तेज रखी जा सकती है? संकेत बताते हैं कि सरकार इसी संतुलन पर काम कर रही है।
टैक्स सिस्टम में बदलाव से बढ़ेगी खर्च करने की ताकत
पिछले कुछ वर्षों में यह साफ हो गया है कि जब उपभोक्ता के हाथ में खर्च करने लायक पैसा होता है, तो बाजार अपने आप चल पड़ता है। बजट 2026 में टैक्स ढांचे को सरल बनाने और अप्रत्यक्ष करों में तर्कसंगत बदलाव की उम्मीद (Tax Relief Middle Class) की जा रही है। GST 2.0 की चर्चा इसी सोच का नतीजा मानी जा रही है, जहां कई टैक्स स्लैब को समेटकर कम और स्पष्ट दरों की ओर बढ़ने पर जोर है। रोजमर्रा की जरूरतों की वस्तुएं, इलेक्ट्रॉनिक्स और किफायती वाहनों पर टैक्स बोझ कम होने से सीधा फायदा उपभोक्ताओं को मिल सकता है।
सस्ती चीजें, मजबूत बाजार
जब उत्पाद सस्ते होते हैं, तो सिर्फ बिक्री ही नहीं बढ़ती, बल्कि बाजार में भरोसा भी लौटता है। बीते समय में यही देखने को मिला है कि टैक्स में राहत का असर खुदरा बिक्री और जीएसटी कलेक्शन दोनों में दिखाई देता है। बजट 2026 से यही उम्मीद की जा रही है कि वह खपत को प्रोत्साहन देकर आर्थिक गतिविधियों को नई ऊर्जा देगा। यह खासतौर पर छोटे शहरों और कस्बों के लिए अहम है, जहां मांग बढ़ने से रोजगार के मौके भी पैदा होते हैं।
पेट्रोल-डीजल और बिजली पर बड़ा फैसला?
आज भी पेट्रोल, डीजल, गैस और एयर टर्बाइन फ्यूल जैसे जरूरी संसाधन जीएसटी के दायरे से बाहर हैं। इसका सीधा असर ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत पर पड़ता है, जो अंततः महंगाई (Tax Relief Middle Class) बढ़ाता है। यदि बजट 2026 में इन्हें चरणबद्ध तरीके से जीएसटी में शामिल करने की दिशा में ठोस संकेत मिलते हैं और राज्यों के राजस्व हितों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है, तो इसका फायदा हर उपभोक्ता को महसूस होगा। इसी तरह बिजली और रियल एस्टेट को जीएसटी में लाने से छिपे हुए टैक्स कम हो सकते हैं, जिससे घर बनाना और बिजली का इस्तेमाल दोनों सस्ते हो सकते हैं।
मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगी नई ताकत
भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की बात लंबे समय से हो रही है। लेकिन इसके लिए सिर्फ योजनाएं नहीं, बल्कि सरल और भरोसेमंद टैक्स सिस्टम भी जरूरी है। इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़े नियमों में यदि व्यावहारिक सुधार होते हैं, तो कंपनियों की लागत घटेगी और उत्पादन सस्ता होगा। इसका सीधा असर कीमतों और रोजगार दोनों पर पड़ेगा। बजट 2026 में इसी दिशा में कदम उठाए जाने की उम्मीद की जा रही है।
रिफंड और विवाद समाधान पर फोकस जरूरी
व्यापार जगत के लिए एक बड़ी चुनौती उल्टे टैक्स स्ट्रक्चर और रिफंड में देरी रही है। इनपुट सर्विस और कैपिटल गुड्स पर फंसा पैसा कंपनियों की नकदी को प्रभावित करता है। अगर बजट में रिफंड प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने के उपाय सामने आते हैं, तो बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को सस्ते विकल्प मिलेंगे। इसके साथ ही टैक्स विवादों के त्वरित समाधान से कारोबार का माहौल और मजबूत होगा।
उपभोक्ता विश्वास ही विकास की कुंजी
बजट 2026 सरकार के पास एक ऐसा मौका है, जहां कर सुधारों के जरिए वह उपभोक्ता विश्वास को और गहरा कर सकती है। कम टैक्स बोझ, सरल नियम, बेहतर क्रेडिट व्यवस्था और आसान कारोबार—ये सभी मिलकर खपत आधारित अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई दे सकते हैं। जब आम आदमी निश्चिंत होकर खर्च करेगा, तभी बाजार चलेगा, उद्योग बढ़ेगा और विकास की कहानी आगे बढ़ेगी।


