सीजी भास्कर, 25 मार्च| मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका की ओर से पेश की गई 15 सूत्रीय युद्धविराम योजना ने कूटनीतिक हलचल को और तेज (Trump Iran Ceasefire Plan) कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को भेजे गए इस प्रस्ताव को लेकर जहां वाशिंगटन इसे शांति की दिशा में पहल बता रहा है, वहीं तेहरान ने इसे सख्त और अस्वीकार्य शर्तों वाला दस्तावेज मानते हुए लगभग खारिज कर दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान से उसके परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करने, यूरेनियम संवर्धन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने और मिसाइल कार्यक्रम सीमित करने जैसी कड़ी शर्तें रखी हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को पूरी पारदर्शिता देने और क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क खत्म करने की भी मांग की गई है।
इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें केवल युद्धविराम नहीं, बल्कि ईरान की सैन्य और रणनीतिक क्षमताओं को नियंत्रित करने का व्यापक खाका पेश किया गया है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे “डील से ज्यादा दबाव की रणनीति” मान रहे हैं।
ईरान की शर्तें: समझौते से पहले सम्मान
दूसरी तरफ ईरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी तरह का आंशिक समझौता स्वीकार नहीं करेगा। तेहरान की मांग है कि युद्धविराम पूरी तरह लागू हो, जिसमें अमेरिका और इजरायल दोनों शामिल (Trump Iran Ceasefire Plan) हों। साथ ही, उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को “संप्रभु अधिकार” बताते हुए इसे छोड़ने से इनकार कर दिया है।
ईरान ने यह भी कहा है कि युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई, भविष्य में हमले न करने की गारंटी और क्षेत्रीय नीतियों में हस्तक्षेप न करना किसी भी बातचीत की बुनियादी शर्तें होंगी।
पाकिस्तान की एंट्री और बढ़ी कूटनीतिक हलचल
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा में है। जानकारी के अनुसार, अमेरिका ने ईरान तक यह प्रस्ताव पहुंचाने के लिए पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाया है। इससे संकेत मिलते हैं कि पर्दे के पीछे बातचीत की कोशिशें तेज हो चुकी हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर दोनों पक्षों के बयान एक-दूसरे के बिल्कुल उलट हैं।
जमीनी हालात: बातचीत के साथ बढ़ती सैन्य तैयारी
एक ओर जहां कूटनीति चल रही है, वहीं दूसरी ओर सैन्य गतिविधियां भी तेज (Trump Iran Ceasefire Plan) हो रही हैं। अमेरिका मध्य-पूर्व में अतिरिक्त सैनिक तैनात करने की तैयारी कर रहा है, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह “बातचीत के साथ दबाव” की रणनीति है, ताकि ईरान को बातचीत की टेबल पर मजबूर किया जा सके।
सबसे बड़ा सवाल: क्या संभव है समझौता?
मौजूदा हालात में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह प्रस्ताव किसी ठोस नतीजे तक पहुंच पाएगा। अमेरिका की शर्तें बेहद सख्त हैं, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और रणनीतिक अधिकारों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। ऐसे में यह साफ है कि युद्धविराम की राह आसान नहीं है। दोनों देशों के बीच अविश्वास, क्षेत्रीय राजनीति और सैन्य दबाव इस पूरे मामले को और जटिल बना रहे हैं। फिलहाल, दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह 15 सूत्रीय योजना शांति की शुरुआत बनेगी या फिर एक और बड़े टकराव की भूमिका तैयार करेगी।


