सीजी भास्कर 4 फ़रवरी User Data Privacy Debate : यूजर्स की निजी जानकारी को लेकर लंबे समय से चल रही बहस को एक बार फिर हवा मिली है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp और उसकी पेरेंट कंपनी मेटा को यूजर प्राइवेसी के मुद्दे पर सख्त टिप्पणी करते हुए साफ संकेत दिया कि डेटा के दुरुपयोग को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत की इस सख्ती के बाद टेक इंडस्ट्री में हलचल तेज हो गई।
कोर्ट का स्पष्ट संदेश
शीर्ष अदालत ने यह रेखांकित किया कि किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म को यूजर्स के डेटा के साथ मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती। प्राइवेसी को मौलिक अधिकार मानते हुए कोर्ट ने कहा कि टेक कंपनियों को अपनी नीतियों में पारदर्शिता रखनी होगी, ताकि आम यूजर भ्रमित न हो।
2004 की बातचीत फिर चर्चा में
इसी बीच, Telegram के संस्थापक और सीईओ Pavel Durov ने सोशल मीडिया पर फेसबुक के शुरुआती दिनों से जुड़ा एक पुराना चैट स्क्रीनशॉट साझा किया। यह बातचीत साल 2004 की बताई जा रही है, जब Mark Zuckerberg हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे और Facebook की शुरुआत हुई थी।
स्क्रीनशॉट में दिखाई दे रहा है कि किस तरह निजी जानकारी—ईमेल, फोटो, एड्रेस जैसी डिटेल्स—को लेकर हल्के-फुल्के अंदाज़ में बात की जा रही थी।
‘स्केल बदला, सोच वही’ का तंज
Telegram CEO ने इस चैट को साझा करते हुए लिखा कि तब और अब में सिर्फ एक फर्क है—स्केल। पहले कुछ हजार लोग थे, अब अरबों। उनका इशारा सीधे तौर पर मेटा की मौजूदा डेटा पॉलिसी पर था, जिसके अंतर्गत Facebook, Instagram और WhatsApp जैसे बड़े प्लेटफॉर्म आते हैं।
दावे और सवाल
WhatsApp लगातार यह दावा करता रहा है कि उसके मैसेज एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन से सुरक्षित हैं, यानी भेजने और पाने वाले के अलावा कोई तीसरा उन्हें नहीं पढ़ सकता। लेकिन आलोचकों का कहना है कि भले ही मैसेज सुरक्षित हों, लेकिन यूजर का मेटाडेटा—जैसे किससे बात हो रही है, कितनी बार और कब—अब भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
यूजर्स की चिंता क्यों बढ़ी
Zuckerberg की पुरानी चैट और सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने मिलकर यूजर्स के मन में यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या वे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अपने निजी डेटा को लेकर वाकई सुरक्षित हैं, या सिर्फ भरोसे के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।




