सीजी भास्कर, 16 जनवरी। जून 2025 में इजराइल और अमेरिका के साथ चली 12 दिन की जंग ने ईरान की सैन्य तैयारियों और वायु रक्षा क्षमताओं की वास्तविक (Russia Weapons Failure) स्थिति को दुनिया के सामने ला दिया, जहां रूस से खरीदे गए अत्याधुनिक बताए जाने वाले हथियार ईरान के लिए प्रभावी साबित नहीं हो सके।
इस संघर्ष के दौरान इजराइली और अमेरिकी वायुसेना ने ईरान की एयर डिफेंस प्रणाली को लगभग निष्क्रिय करते हुए बिना किसी बड़ी बाधा के देश के भीतर गहराई तक हमले किए और कई अहम सैन्य व रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया।
रूस से मिली S-300 एयर डिफेंस प्रणाली के साथ-साथ ईरान की स्वदेशी बावर-373 और खोरदाद-15 सिस्टम भी इन हमलों को रोकने में नाकाम (Russia Weapons Failure) रहीं, जिससे ईरान की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। 22 जून 2025 को अमेरिका द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के तहत B-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर विमानों ने फोर्डो, नतांज और इस्फहान स्थित परमाणु ठिकानों पर भारी हमला किया,
जिसमें 30 हजार पाउंड वजनी बंकर बस्टर बमों और टॉमहॉक मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन ईरान की वायु रक्षा प्रणाली इन अत्याधुनिक हमलों का कोई प्रभावी जवाब नहीं दे सकी। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की सबसे बड़ी कमजोरी उसके अलग-अलग एयर डिफेंस सिस्टम के बीच तालमेल की भारी कमी रही, जहां रडार नेटवर्क, कमांड सिस्टम और डेटा शेयरिंग एक-दूसरे से सही तरीके से जुड़े नहीं थे,
जिससे एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार ही नहीं हो पाया। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर इजराइल के F-35, F-15 और F-16 जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों ने ईरान के भीतर लगभग निर्बाध तरीके से ऑपरेशन को अंजाम दिया।
जंग के बाद ईरान के रणनीतिक हलकों में यह स्पष्ट (Russia Weapons Failure) हो गया कि रूस पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा साबित हो सकता है,
खासकर तब जब 2023 में रूस द्वारा वादा किए गए करीब दो दर्जन Su-35 लड़ाकू विमान अब तक ईरान को नहीं मिले और कुछ रिपोर्ट्स में इनके अल्जीरिया भेजे जाने की बात सामने आई। इस स्थिति के बाद ईरान ने रक्षा साझेदारी के लिए चीन की ओर झुकाव बढ़ाया है और भविष्य में HQ-9 जैसे चीनी एयर डिफेंस सिस्टम पर गंभीरता से विचार शुरू कर दिया है।
अब तक ईरान रूस से MiG-29, Su-24, Mi-28 हेलीकॉप्टर, Yak-130 ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट और S-300 जैसे हथियार हासिल कर चुका है, लेकिन जून 2025 की जंग ने यह साफ कर दिया कि कई रूसी हथियार आधुनिक पश्चिमी सैन्य तकनीक के सामने टिकाऊ साबित नहीं हो पाए, जिससे ईरान की सैन्य रणनीति में बड़े बदलाव की संभावनाएं तेज हो गई हैं।


