(Wrestling Gold Story) की यह कहानी सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि हालात से लड़कर खुद को साबित करने की मिसाल है। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के पहले संस्करण में कर्नाटक की मनीषा जोंस सिद्दी ने 76 किलो वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर यह दिखा दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी मुश्किल रास्ता रोक नहीं सकता। उनकी जीत ने पूरे खेल जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
पिता के जाने के बाद मां बनी असली ताकत
मनीषा के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब वह सिर्फ पांचवीं कक्षा में थीं और उनके पिता का निधन हो गया। परिवार पर अचानक आई इस जिम्मेदारी को उनकी मां ने संभाला। (Inspiration Story) के रूप में उनकी मां ने हर कदम पर साथ दिया, कभी हिम्मत नहीं टूटने दी। मनीषा बताती हैं कि अगर मां का साथ नहीं होता, तो शायद वह यहां तक नहीं पहुंच पातीं।
हार से सीखकर बनाई जीत की राह
मनीषा का यह सफर एक दिन में तय नहीं हुआ। इससे पहले उन्होंने कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में रजत और कांस्य पदक जीते, लेकिन हर हार ने उन्हें कुछ नया सिखाया। (Khelo India Winner) बनने से पहले उन्होंने खुद को हर बार बेहतर किया, अपनी कमियों पर काम किया और अंत में गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया।
कोच, स्पोर्ट्स हॉस्टल और परिवार का मिला साथ
मनीषा ने अपनी सफलता का श्रेय सिर्फ खुद को नहीं दिया। उन्होंने कर्नाटक के स्पोर्ट्स हॉस्टल, अपने कोच और साथियों को भी धन्यवाद कहा। उनका बड़ा भाई हमेशा उन्हें सही दिशा दिखाता रहा, वहीं छोटा भाई भी खिलाड़ी है, जो हर वक्त उनका हौसला बढ़ाता है। यही टीमवर्क उनकी ताकत बना।
ट्राइबल गेम्स ने दिया नया मंच
खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स ने देश के जनजातीय खिलाड़ियों को एक बड़ा मंच दिया है। (Tribal Athletes India) के तहत मनीषा जैसी प्रतिभाएं अब सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि यह मंच सिर्फ प्रतियोगिता नहीं, बल्कि पहचान बनाने का अवसर है, जहां से खिलाड़ी अपने सपनों को उड़ान दे सकते हैं।
अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर नजर, लक्ष्य और बड़ा
स्वर्ण पदक जीतने के बाद मनीषा का आत्मविश्वास और भी मजबूत हुआ है। अब उनका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करना है। वह चाहती हैं कि एक दिन विश्व स्तर पर गोल्ड जीतकर देश का नाम रोशन करें और अपनी मां के सपनों को पूरा करें।


