सीजी भास्कर 24 अप्रैल
खैरागढ़। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई क्षेत्र के ठाकुरटोला जमींदारी में स्थित मण्डीप खोल गुफा एक बार फिर आस्था का बड़ा केंद्र बनने जा रही है। साल में सिर्फ एक दिन खुलने वाली यह गुफा 27 अप्रैल को श्रद्धालुओं के लिए खोली जाएगी। इस मौके पर लाखों लोगों के पहुंचने की संभावना को देखते हुए जिला प्रशासन सुरक्षा, स्वास्थ्य, यातायात और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर पूरी तरह सतर्क है।
परंपरा और रहस्य से जुड़ी अनोखी गुफा
मण्डीप खोल गुफा केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि परंपरा और रहस्य से जुड़ा विशेष स्थान भी है। मान्यता है कि यह गुफा अक्षय तृतीया के बाद आने वाले पहले सोमवार को ही खुलती है और इसी दिन यहां भगवान शिव के दुर्लभ दर्शन होते हैं।
पहले राजपरिवार की पूजा, फिर आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन
गुफा खुलने के बाद सबसे पहले ठाकुरटोला राजपरिवार पूजा-अर्चना करता है, जिसके बाद आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन शुरू होते हैं। घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित इस गुफा तक पहुंचना आसान नहीं है। श्रद्धालुओं को कठिन रास्तों और नदी पार कर यहां तक पहुंचना पड़ता है, जिससे यह यात्रा आस्था के साथ साहस और रोमांच से भी जुड़ जाती है।
प्राकृतिक शिवलिंग और ‘श्वेत गंगा’ का महत्व
गुफा के भीतर प्राकृतिक शिवलिंग, पवित्र कुंड और ‘श्वेत गंगा’ नाम की जलधारा मौजूद है, जो इसे विशेष बनाती है। यह जलधारा आसपास के क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत भी मानी जाती है। यही कारण है कि यह स्थान आस्था और प्रकृति के अद्भुत संगम के रूप में जाना जाता है और हर साल कई राज्यों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
वैज्ञानिकों ने जताई संरक्षण की चिंता
हाल के अध्ययनों में सामने आया है कि यह गुफा एक संवेदनशील प्राकृतिक तंत्र है, जहां हमेशा अंधेरा, नमी और स्थिर वातावरण बना रहता है। यहां के जीव-जंतु इसी माहौल के अनुकूल विकसित हुए हैं और बाहरी हस्तक्षेप से इस संतुलन के बिगड़ने का खतरा रहता है।
भीड़ और प्रदूषण से हो सकता है नुकसान
विशेषज्ञों का मानना है कि गुफा की एक सीमा होती है और अधिक भीड़ से शोर, कंपन और प्रदूषण बढ़ता है, जिससे वहां की जैव विविधता और संरचना को नुकसान हो सकता है। गुफा वैज्ञानिक डॉ. जयंत बिस्वास के अनुसार, गुफा तब तक “जीवित” रहती है जब तक उसकी जैव विविधता सुरक्षित रहती है।
संरक्षण के लिए संतुलित उपाय जरूरी
डॉ. बिस्वास ने कोटुमसर गुफा का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां पहले अंदर पूजा-पाठ होता था, जिसे बाद में बाहर स्थानांतरित किया गया। उनका कहना है कि इसी तरह के उपाय अपनाकर आस्था और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा पर विशेष फोकस
जिला पंचायत सीईओ प्रेमकुमार पटेल ने बताया कि इस बार भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से दर्शन कर सकें और गुफा के प्राकृतिक संतुलन को भी नुकसान न पहुंचे।
27 अप्रैल को मण्डीप खोल गुफा में एक बार फिर आस्था का सैलाब उमड़ेगा, लेकिन इसके साथ यह जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम है कि इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जाए।


