सीजी भास्कर, 28 अप्रैल : छत्तीसगढ़ की ग्रामीण धरा पर जल संरक्षण की एक नई इबारत लिखी जा रही है। राज्य सरकार द्वारा जल प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के परिणामस्वरूप अब गांवों की सूखी जमीन फिर से हरी-भरी होने लगी है। विशेष रूप से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के माध्यम से निर्मित चेक डैम न केवल जल संचय कर रहे हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को भी मजबूत कर रहे हैं। इस (Water Conservation Impact) का सबसे सुखद परिणाम बलरामपुर जिले के राजपुर जनपद के ग्राम पंचायत बदौली में देखने को मिल रहा है, जहाँ जल संकट अब अतीत की बात हो गई है।
पलायन थमा, खुशहाली ने दी दस्तक
कुछ साल पहले तक बदौली गांव के हालात काफी चुनौतीपूर्ण थे। यहां के किसान पूरी तरह मानसूनी बारिश के भरोसे रहते थे। यदि बारिश कम हुई, तो फसल बर्बाद हो जाती थी और गर्मी आते-आते जलस्तर इतना नीचे चला जाता था कि पीने के पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था। सिंचाई की सुविधा न होने के कारण ग्रामीण आजीविका की तलाश में दूसरे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर थे। लेकिन मनरेगा के तहत हुए (Water Conservation Impact) ने इस स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। चेक डैम के निर्माण से अब बारिश का पानी बहकर व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि उसे सहेजकर खेती के काम में लाया जा रहा है।
दोहरी फसल और आय में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी
चेक डैम बनने से सबसे बड़ा बदलाव किसानों की कार्यप्रणाली में आया है। अब यहाँ के 20 से 25 किसान सालभर सिंचाई की सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। पहले जहाँ किसान केवल खरीफ (धान) की फसल तक सीमित थे, अब वे रबी और नगदी फसलों की खेती भी कर रहे हैं। इस (Water Conservation Impact) की वजह से किसान अब टमाटर, मिर्च और अन्य मौसमी सब्जियां उगाकर स्थानीय बाजारों में बेच रहे हैं, जिससे उनकी दैनिक और वार्षिक आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। किसान अब आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
भू-जल स्तर में सुधार और पर्यावरण संतुलन
चेक डैम का लाभ केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को नया जीवन दिया है। जल संग्रहण की इस (Water Conservation Impact) तकनीक से गांव के भू-जल स्तर (Groundwater Level) में भारी सुधार हुआ है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण गांव के उन कुओं और हैंडपंपों में देखा जा सकता है, जो पहले फरवरी-मार्च में सूख जाते थे, लेकिन अब उनमें सालभर पानी रहता है। निस्तारी और पशुओं के पीने के पानी की समस्या का भी स्थायी समाधान हो गया है, जो ग्रामीण जीवन के लिए एक बड़ी राहत है।
किसानों की जुबानी: बदली हुई जिंदगी की कहानी
गांव के प्रगतिशील किसान ईश्वर और कपिल इस बदलाव के प्रत्यक्ष गवाह हैं। वे गर्व से बताते हैं कि चेक डैम बनने के बाद उनकी खेती अब जोखिम भरी नहीं रही। पहले जहाँ पानी की कमी के कारण वे नई तकनीकों को अपनाने से डरते थे, अब वे उन्नत बीजों और आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग कर रहे हैं। इस सकारात्मक (Water Conservation Impact) ने उनके बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव डाला है, क्योंकि अब उनके पास स्थिर आय का स्रोत है।
स्थानीय रोजगार और मनरेगा की सफलता
चेक डैम का निर्माण स्वयं रोजगार का एक बड़ा जरिया बना। मनरेगा के तहत जब इन संरचनाओं का निर्माण हुआ, तो सैकड़ों ग्रामीणों को उनके घर के पास ही काम मिला। निर्माण के दौरान मिले रोजगार और अब खेती में बढ़ी सक्रियता के कारण गांव से होने वाले पलायन में लगभग 80 प्रतिशत की कमी आई है। यह (Water Conservation Impact) दर्शाता है कि ग्रामीण बुनियादी ढांचे में निवेश करना कितना महत्वपूर्ण है।

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़
राज्य सरकार की इन पहलों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जल ही जीवन है और जल ही विकास का आधार है। बदौली जैसे गांव आज पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा के केंद्र बन गए हैं। जल संरक्षण की इस (Water Conservation Impact) को जनआंदोलन का रूप देने से न केवल मिट्टी की नमी लौट रही है, बल्कि किसानों के चेहरे पर खोई हुई मुस्कान भी वापस आ गई है। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले समय में प्रदेश के हर सूखे क्षेत्र में ऐसे ही चेक डैम निर्मित किए जाएं ताकि हर खेत को पानी और हर हाथ को काम मिल सके।



