सीजी भास्कर, 07 जून : जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित मानसून और बढ़ते जल संकट के बीच छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण (Mor Gaon Mor Pani) को जनआंदोलन का रूप देने की दिशा में बड़ा अभियान चलाया जा रहा है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत संचालित “मोर गांव-मोर पानी” अभियान गांवों में जल संरक्षण, रोजगार सृजन, हरित विकास और आजीविका संवर्धन का मजबूत माध्यम बनकर उभर रहा है। राज्यभर में जल संरक्षण को अब केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि सामुदायिक भागीदारी का आंदोलन बनाया जा रहा है।
प्रदेश में इस अभियान के तहत लगभग 1610 करोड़ रुपए की लागत से एक लाख से अधिक जल संरक्षण एवं संवर्धन कार्य किए जा रहे हैं। इनमें तालाब, डबरी, चेकडैम, खेत तालाब, जल संवर्धन संरचनाएं और स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। इनका उद्देश्य वर्षा जल का अधिकतम संचयन कर भू-जल स्तर बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में सालभर जल उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
11 लाख से ज्यादा लोगों को मिल रहा रोजगार
जल संरक्षण के इन कार्यों के माध्यम से प्रदेश में प्रतिदिन 11 लाख से अधिक श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इनमें 57 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। इससे एक ओर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो रहा है तो दूसरी ओर महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती मिल रही है।

आजीविका से जुड़ रहा जल संरक्षण
राज्य सरकार ने जल संरक्षण को सीधे ग्रामीण आय से जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल की है। प्रदेश में समाज के कमजोर और संवेदनशील वर्गों की निजी भूमि पर 13,065 आजीविका डबरियों का निर्माण पूरा किया जा चुका है। इन डबरियों के माध्यम से ग्रामीण परिवार मत्स्य पालन, सब्जी उत्पादन, बागवानी और अन्य आयवर्धक गतिविधियों से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।
इसी तरह “नवा तरिया-आय के जरिया” पहल के अंतर्गत 624 सामुदायिक तालाबों का विकास किया जा रहा है। इन तालाबों को स्वयं सहायता समूहों, विशेषकर महिला समूहों की आजीविका से जोड़ा जा रहा है, जिससे जल संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण का सफल मॉडल विकसित हो रहा है।

पहाड़ियों में ट्रेंच, मैदानों में जल संचयन
प्रदेश के पहाड़ी और ढलान वाले क्षेत्रों में स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच (SCT) का निर्माण किया जा रहा है। ये संरचनाएं बारिश के पानी के तेज बहाव को रोककर उसे जमीन में समाहित होने का अवसर देती हैं। इससे मिट्टी का कटाव कम होता है, भू-जल स्तर में सुधार आता है और वृक्षारोपण के लिए आवश्यक नमी बनी रहती है। जल संरक्षण और हरित विकास के इस संयुक्त प्रयास से पर्यावरणीय संतुलन को भी मजबूती मिल रही है।
तकनीक की मदद से हो रहा वैज्ञानिक प्रबंधन
अभियान की सबसे बड़ी विशेषता आधुनिक तकनीकों का उपयोग है। कार्यों की योजना और क्रियान्वयन के लिए GIS आधारित युक्तधारा प्लानिंग, CLART एप और वाटरशेड सिद्धांतों का उपयोग किया जा रहा है।
भू-जल स्तर की निगरानी के लिए जलदूत प्रणाली लागू की गई है, जिसके तहत खुले कुओं के जल स्तर का नियमित मापन किया जा रहा है। ग्राम पंचायतों में जल स्तर की जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित कर जल बजट तैयार करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
पारदर्शिता और जनभागीदारी बना आधार
मनरेगा कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ग्राम पंचायतों में क्यूआर कोड आधारित सूचना प्रणाली विकसित की गई है। इसके माध्यम से ग्रामीण अपने गांव में स्वीकृत, प्रगतिरत और पूर्ण हो चुके कार्यों की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
रोजगार दिवस, आवास दिवस, सामाजिक अंकेक्षण और जनसंवाद कार्यक्रमों के जरिए लोगों की भागीदारी और निगरानी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
जनआंदोलन का रूप ले चुका है अभियान
जनप्रतिनिधियों, पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, युवाओं और ग्रामीण समुदाय की सक्रिय भागीदारी से “मोर गांव-मोर पानी” (Mor Gaon Mor Pani) अभियान अब जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है। जागरूकता कार्यक्रमों और ग्राम सभाओं के माध्यम से जल संरक्षण को लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ का यह मॉडल यह साबित कर रहा है कि जल संरक्षण, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, तकनीकी नवाचार और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ जोड़कर ग्रामीण विकास की स्थायी नींव रखी जा सकती है। यह केवल पानी बचाने का अभियान नहीं, बल्कि गांवों में आत्मनिर्भरता, समृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन की नई कहानी भी लिख रहा है।



