सीजी भास्कर, 15 जून। पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से एक ऐसे नाम की चर्चा तेज (West Bengal Politics) हो गई है, जिसके बारे में पहले बहुत कम लोग जानते थे। राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच तक इस पार्टी को लेकर जिज्ञासा बढ़ गई है। वजह यह है कि एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद इस संगठन का नाम अचानक सुर्खियों में आ गया है।
राजनीतिक जानकारों के बीच भी इस पार्टी को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। अब तक सीमित पहचान रखने वाला यह दल अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। सांसदों के संभावित विलय की खबरों ने इसे एक नई पहचान दिला दी है और लोग इसके गठन से लेकर राजनीतिक सफर तक की जानकारी तलाश रहे हैं।
सांसदों के विलय की चर्चा से बढ़ी पहचान : West Bengal Politics
पश्चिम बंगाल की राजनीति में नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया का नाम तब तेजी से सामने आया, जब तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों के इस दल में शामिल होने की चर्चा शुरू हुई। इस घटनाक्रम ने एक अपेक्षाकृत कम चर्चित पार्टी को अचानक राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया।
कई राज्यों में मौजूदगी का दावा
यह पार्टी पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा समेत पूर्वोत्तर क्षेत्र के कुछ हिस्सों में अपनी उपस्थिति रखती है। हालांकि इसका बांग्लादेश की समान नाम वाली पार्टी से कोई संबंध नहीं बताया जाता। इसी तरह इसका संबंध राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से भी नहीं है।
पार्टी नेतृत्व ने दी प्रतिक्रिया
संभावित विलय की खबरों पर पार्टी के संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन सचिव शांतनु डे ने कहा कि पार्टी नेतृत्व ने ऑनलाइन बैठक कर इस घटनाक्रम का स्वागत किया है। उन्होंने बताया कि अब तक पार्टी के अधिकांश निर्णय संगठन के सदस्यों की राय से लिए जाते रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी को लेकर कई जानकारियां अभी स्पष्ट नहीं हैं और संगठन स्तर पर स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
वर्ष 2022 में हुआ था गठन
निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार यह दल वर्ष 2022 में एक गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के रूप में पंजीकृत हुआ था। ऐसे दलों को तब तक मान्यता प्राप्त नहीं होती, जब तक वे चुनाव में निर्धारित मत प्रतिशत या अन्य आवश्यक मानदंड पूरे नहीं कर लेते।
चुनावी मैदान में नहीं मिली सफलता
वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी ने दो सीटों पर उम्मीदवार (West Bengal Politics) उतारे थे। हालांकि उसे सफलता नहीं मिल सकी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पार्टी का चुनावी प्रदर्शन बेहद सीमित रहा और उसे अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिला।
अब बदल सकती है राजनीतिक स्थिति
अब सांसदों के संभावित विलय की चर्चा के बाद पार्टी का राजनीतिक महत्व बढ़ता दिखाई दे रहा है। यदि यह घटनाक्रम आगे बढ़ता है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी की पहचान पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो सकती है।





