सीजी भास्कर, 11 सितंबर : बच्चों के लिए सांसद निधि से स्वीकृत भवन निर्माण अब विवादों में घिर गया है। करीब 15 लाख रुपये की लागत से बनने वाले सरस्वती शिशु मंदिर भवन (Pendra Saraswati Shishu Mandir) का काम तकनीकी सुधार के बाद दोबारा शुरू हुआ, लेकिन फिर शिकायत सामने आने से निर्माण कार्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। नगर पालिका अध्यक्ष ने मामले की निष्पक्ष तकनीकी और राजस्व जांच कराने की मांग करते हुए कहा है कि यदि निर्माण गुणवत्ता के अनुरूप है तो इसे अनावश्यक विवाद के कारण नहीं रोका जाना चाहिए।
मामला पेंड्रा स्थित सरस्वती शिशु मंदिर का है। बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद एवं केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू की सांसद निधि से भवन निर्माण के लिए करीब 15 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं। नगर पालिका परिषद पेंड्रा ने निविदा प्रक्रिया पूरी करने के बाद निर्माण शुरू कराया था और शिशु मंदिर समिति के सदस्यों ने भूमि पूजन भी किया था।
गुणवत्ता शिकायत के बाद तकनीकी जांच
निर्माण के दौरान सरस्वती शिशु मंदिर समिति के अध्यक्ष नीरज जैन ने भवन की गुणवत्ता को लेकर शिकायत की। इसके बाद नगर पालिका के उपअभियंता सुरेंद्र श्रीवास ने मौके का निरीक्षण किया और निर्माण में आवश्यक तकनीकी सुधार के निर्देश दिए।
बताया गया कि भवन के पीछे के प्लिंथ में आरसीसी वॉल सहित कुछ जरूरी तकनीकी सुधार किए जाने हैं। उपअभियंता ने निर्माण की गुणवत्ता से समझौता नहीं करने और स्वयं मौके पर मौजूद रहकर काम की निगरानी करने की बात कही। इसके बाद 10 सितंबर 2026 को निर्माण कार्य दोबारा शुरू किया गया।
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दोबारा शिकायत से उठे सवाल
काम दोबारा शुरू होते ही फिर शिकायत सामने आने से निर्माण को लेकर विवाद गहरा गया है। सवाल यह उठ रहा है कि जब तकनीकी अधिकारी मौके का निरीक्षण कर चुके हैं और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुधार बताए गए हैं, तो इसके बाद बार-बार शिकायत कर निर्माण कार्य में बाधा क्यों डाली जा रही है।
यह पूरा मामला निर्माण कार्य की गुणवत्ता (Pendra Saraswati Shishu Mandir) और उससे जुड़े विवाद की निष्पक्ष जांच का विषय बन गया है। हालांकि शिकायतों के पीछे वास्तविक कारण क्या है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
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पीछे की जमीन पर भी विवाद
विद्यालय के पीछे स्थित जमीन को लेकर भी स्थानीय स्तर पर अलग-अलग चर्चाएं सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि गोरेला के एक जायसवाल परिवार द्वारा इस जमीन को अमरकंटक स्थित शांति कुटीर आश्रम को मंदिर निर्माण के उद्देश्य से दान किए जाने की बात कही जाती है। इसके बावजूद भूमि के उपयोग और कथित बिक्री को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
यदि विद्यालय के पीछे की जमीन पर किसी कॉलोनी या अन्य निर्माण की योजना है और वहां पहुंच मार्ग के लिए सरस्वती शिशु मंदिर की जमीन का इस्तेमाल किए जाने का प्रयास हो रहा है, तो भूमि स्वामित्व, राजस्व रिकॉर्ड, दानपत्र, बिक्री दस्तावेज और प्रस्तावित रास्ते से जुड़े दावों की जांच जरूरी होगी।
भू-व्यवसाय से सांठगांठ का शक
मामले में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि कहीं विद्यालय की जमीन से रास्ता निकालने के लिए किसी पक्ष की ओर से दबाव, प्रलोभन या अन्य प्रयास तो नहीं किया जा रहा। हालांकि भू-माफिया से संभावित सांठगांठ (Pendra Saraswati Shishu Mandir) का यह आरोप फिलहाल जांच के दायरे में है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
ऐसे में प्रशासन के लिए जरूरी होगा कि विद्यालय की जमीन और उसके आसपास की भूमि से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच करे। इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि जमीन का वास्तविक स्वामित्व किसके पास है और प्रस्तावित रास्ते को लेकर किए जा रहे दावों में कितनी सच्चाई है।
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‘सांसद निधि का पैसा न अटके’
नगर पालिका अध्यक्ष राकेश जालान ने कहा कि सांसद निधि से स्वीकृत राशि जनता और बच्चों के हित के लिए है। यदि निर्माण में कोई कमी है तो तकनीकी जांच कर उसे दूर किया जाना चाहिए, लेकिन गुणवत्ता मानकों के अनुरूप काम होने की स्थिति में अनावश्यक रूप से निर्माण रोकना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि भवन का निर्माण गुणवत्तापूर्ण और पारदर्शी तरीके से होना चाहिए तथा सांसद निधि से स्वीकृत राशि का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। यदि निर्माण रोकने के पीछे किसी व्यक्ति, संस्था या भू-व्यवसाय से जुड़ा हित (Pendra Saraswati Shishu Mandir) सामने आता है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
राकेश जालान ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की तकनीकी और राजस्व जांच कराने की मांग की है। उन्होंने विद्यालय की भूमि, आसपास की जमीन के स्वामित्व और रास्ते से जुड़े दावों के साथ सांसद निधि से स्वीकृत भवन निर्माण की गुणवत्ता की भी जांच कराने की बात कही है।
उन्होंने कहा कि जांच में किसी भी पक्ष की गलती सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन बच्चों के लिए स्वीकृत विकास कार्य को अनावश्यक विवाद के कारण लंबित नहीं रखा जाना चाहिए।
अब नजर जिला प्रशासन की जांच पर है। जांच से यह स्पष्ट होगा कि निर्माण कार्य में वास्तव में कोई तकनीकी कमी है या विवाद के पीछे भूमि और रास्ते से जुड़े हित भी हैं। इसके बाद ही तय होगा कि सांसद निधि से स्वीकृत भवन का निर्माण किस तरह और कितनी तेजी से पूरा हो पाएगा।
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