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Bhilai Municipal Corporation Elections : आरक्षण ने बदला सियासी गणित, 19 महिला और 23 OBC सीटों ने कई दिग्गजों की राह रोकी, OBC महापौर सीट बनी सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा

By Newsdesk Admin
11/09/2026
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Bhilai Municipal Corporation Elections
Bhilai Municipal Corporation Elections

25 साल के इतिहास में पहली बार स्थानीय मुद्दों के साथ जातीय समीकरण भी निर्णायक

– संतोष मिश्रा

Contents
  • 25 साल के इतिहास में पहली बार स्थानीय मुद्दों के साथ जातीय समीकरण भी निर्णायक
  • आरक्षण की पूरी तस्वीर : Bhilai Municipal Corporation Elections
  • वार्डवार आरक्षण ने किन बड़े चेहरों को रोका?
  • कुछ अन्य वार्डों में भी पुरुष पार्षदों की राह कठिन : Bhilai Municipal Corporation Elections
  • महापौर नीरज पाल बच गए, लेकिन नई चुनौती सामने
  • 25 साल में कांग्रेस की मजबूत पकड़, भाजपा का केवल एक महापौर कार्यकाल
  • इस बार चुनाव में कौन-कौन से मुद्दे हावी रहेंगे? : Bhilai Municipal Corporation Elections
  • भ्रष्टाचार और प्रशासनिक टकराव
  • बीएसपी क्षेत्र और पटरी पार का अंतर : Bhilai Municipal Corporation Elections
  • कांग्रेस के सामने क्या चुनौती?
  • भाजपा के सामने कैसा अवसर : Bhilai Municipal Corporation Elections
  • किसके कब्जे में जाएगा भिलाई निगम?
  • महापौर की ओबीसी सीट बनेगी असली राजनीतिक परीक्षा
  • आरक्षण ने एक और बड़ा अवसर किया पैदा : Bhilai Municipal Corporation Elections

सीजी भास्कर, 11 सितंबर। नगर पालिक निगम भिलाई के आगामी चुनाव के लिए 70 वार्डों का आरक्षण तय होते ही शहर की राजनीति ने नई करवट ले ली है। 9 सितंबर को सेक्टर-6 स्थित कला मंदिर में हुई आरक्षण प्रक्रिया ने कई मौजूदा पार्षदों के राजनीतिक समीकरण बदल दिए। अब कांग्रेस और भाजपा दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल जीतने की नहीं, बल्कि सही वार्ड में सही चेहरे को उतारने की है। (Bhilai Municipal Corporation Elections)

 

आपको बता दें कि आरक्षण बाद भिलाई में 23 वार्ड ओबीसी, 9 वार्ड एससी और 3 वार्ड एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हुए हैं। इसके आलावा 24 वार्ड अनारक्षित हैं। इनमें 11 वार्ड सामान्य महिला के लिए आरक्षित हैं। ओबीसी के 23 वार्डों में 8 ओबीसी महिला और 15 ओबीसी मुक्त हैं। एसटी के तीन वार्डों में एक महिला और दो मुक्त हैं। एससी के नौ वार्डों में तीन महिला और छह मुक्त हैं।

आरक्षण की पूरी तस्वीर : Bhilai Municipal Corporation Elections

एससी मुक्त वार्ड 1, 5, 9, 32, 36 और 51 हैं जबकि एससी महिला वार्ड 8, 43 और 69 हैं। इसी तरह एसटी मुक्त वार्ड 52 और 62 हैं जबकि एसटी महिला वार्ड 61के लिए आरक्षित हैं। ओबीसी मुक्त वार्ड 2, 3, 4, 10, 19, 21, 27, 39, 40, 42, 44, 46, 49, 56 और 68 हैं तो ओबीसी महिला के लिए वार्ड 6, 7, 26, 37, 38, 45, 54 और 66 आरक्षित है। सामान्य महिला के लिए वार्ड 11, 12, 15, 23, 24, 29, 35, 47, 48, 63 और 70 है जबकि सामान्य मुक्त वार्ड 13, 14, 16, 17, 18, 20, 22, 25, 28, 30, 31, 33, 34, 41, 50, 53, 55, 57, 58, 59, 60, 64, 65 और 67 हैं।

 

वार्डवार आरक्षण ने किन बड़े चेहरों को रोका?

आरक्षण के बाद सबसे अधिक चर्चा उन वार्डों की है, जहां मौजूदा चर्चित पार्षद अपने वर्तमान वार्ड से दोबारा चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। वार्ड 5 कोसा नगर से कांग्रेस पार्षद संदीप निरंकारी का वार्ड एससी के लिए आरक्षित हुआ है। पूर्व विधायक के पुत्र और कांग्रेस पार्षद संदीप निरंकारी के लिए मौजूदा वार्ड से चुनाव लड़ने की राह बंद मानी जा रही है।

इसी तरह वार्ड 7 राधिकानगर से कांग्रेस पार्षद आदित्य सिंह का वार्ड ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुआ है इसलिए मौजूदा पुरुष पार्षद के सामने अब दूसरे वार्ड की तलाश भी चुनौती है। वार्ड 12 रानी अवंती बाई कोहका से पार्षद और सभापति गिरवर बंटी साहू का वार्ड सामान्य महिला के खाते में गया है। निगम के सभापति गिरवर बंटी साहू को अब दूसरे वार्ड से राजनीतिक जमीन तलाशनी होगी।

वार्ड 26 रामनगर मुक्तिधाम से पार्षद और मौजूदा विधायक रिकेश सेन का वार्ड ओबीसी महिला के लिए आरक्षित है। मौजूदा भाजपा पार्षद और वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन के लिए यह वार्ड अब उनकी वर्तमान स्थिति में चुनाव योग्य नहीं रहेगा। वार्ड 37 संत रविदास नगर पार्षद मन्नान गफ्फार खान का वार्ड ओबीसी महिला हुआ है।

कांग्रेस के मन्नान गफ्फार खान को भी अब नए विकल्प की तलाश करनी होगी। वार्ड 42 गौतम नगर खुर्सीपार से भाजपा के श्याम बहादुर सिंह उर्फ विनोद सिंह का वार्ड ओबीसी के लिए आरक्षित हुआ है। उनके सामने भी नए वार्ड का विकल्प तलाशने की स्थिति बनी है।

वार्ड 44 लक्ष्मीनारायण वार्ड से भाजपा के चर्चित नेता और निगम में उपनेता प्रतिपक्ष दया सिंह के वार्ड को ओबीसी आरक्षण मिला है। इस बदलाव को उनके लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। वार्ड 47 राधाकृष्ण मंदिर से पार्षद व जोन अध्यक्ष भूपेंद्र यादव के वार्ड को सामान्य महिला के लिए आरक्षित किया गया है। अब उन्हें दूसरे वार्ड में टिकट की तलाश करनी होगी। वार्ड 63 सेक्टर-6 पश्चिम अब सामान्य महिला के लिए आरक्षित है।

कांग्रेस के साकेत चंद्राकर का वर्तमान वार्ड बदलना लगभग तय और राजनीतिक चुनौती बन गया है। वार्ड 66 सेक्टर-7 पूर्व से पार्षद लक्ष्मीपति राजू का वार्ड ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुआ है। राजू के लिए वार्ड 67 संभावित विकल्प के रूप में चर्चा में है। खास बात यह है कि वे 2015 में वार्ड 67 से लगातार पार्षद रह चुके हैं। इसी तरह वार्ड 70 शहीद कौशल सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने से कांग्रेस के सीजू एंथोनी के सामने भी नया वार्ड तलाशने की चुनौती है।

 

कुछ अन्य वार्डों में भी पुरुष पार्षदों की राह कठिन : Bhilai Municipal Corporation Elections

ओबीसी महिला, एससी महिला और एसटी महिला के लिए आरक्षित वार्डों में मौजूदा पुरुष पार्षदों के सामने भी स्वाभाविक रूप से वर्तमान वार्ड से चुनाव लड़ने की बाध्यता है। वार्ड 6 के रविशंकर कुर्रे, वार्ड 38 के पीयूष मिश्रा, वार्ड 45 के पी श्याम सुंदर राव और वार्ड 61 के सेवन कुमार के वार्ड क्रमशः ओबीसी महिला या एसटी महिला श्रेणी में चले गए हैं। इन मामलों में अंतिम राजनीतिक पात्रता संबंधित उम्मीदवार की आरक्षण श्रेणी और निर्वाचन नियमों पर निर्भर करेगी।

 

महापौर नीरज पाल बच गए, लेकिन नई चुनौती सामने

भिलाई के मौजूदा महापौर नीरज पाल का वार्ड 60 है और यह वार्ड सामान्य मुक्त श्रेणी में रखा गया है इसलिए उनके लिए अपने वर्तमान वार्ड से पार्षद चुनाव लड़ने का रास्ता खुला है। निगम की आधिकारिक सूची में भी नीरज पाल वार्ड 60 के पार्षद के रूप में दर्ज हैं लेकिन महापौर की कुर्सी का समीकरण अलग है। भिलाई महापौर पद ओबीसी के लिए आरक्षित है। इसका मतलब है कि अब कांग्रेस और भाजपा दोनों को पार्षद टिकट के साथ-साथ ऐसे ओबीसी चेहरे की तलाश करनी होगी, जिसकी शहरव्यापी स्वीकार्यता हो।

25 साल में कांग्रेस की मजबूत पकड़, भाजपा का केवल एक महापौर कार्यकाल

भिलाई नगर निगम का गठन 8 जून 1998 को हुआ था। निगम की पहली निर्वाचित महापौर कांग्रेस की नीता लोधी बनीं और उनका कार्यकाल 16 अगस्त 2000 से 15 अगस्त 2005 तक रहा। इसके बाद 2006 में भाजपा के विद्यारतन भसीन महापौर बने और जनवरी 2011 तक पद पर रहे। इसके बाद कांग्रेस की निर्मला यादव महापौर बनीं। 2016 में कांग्रेस के युवा नेता देवेंद्र यादव महापौर बने और 2021 तक निगम की कमान संभाली। प्रशासनिक अवधि के बाद 2022 में कांग्रेस के नीरज पाल महापौर चुने गए।

2015 में देवेंद्र यादव ने भाजपा के विद्यारतन भसीन को हराकर महापौर पद हासिल किया था। वे उस समय देश के सबसे कम उम्र के महापौरों में शामिल हुए।

2021 के चुनाव में कांग्रेस ने 70 में से 37 वार्ड जीते जबकि भाजपा को 24 वार्ड मिले और 9 सीटों पर निर्दलीय विजयी रहे। इसके बाद महापौर पद भी कांग्रेस के पास गया यानि 25 साल के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि भिलाई निगम का मूल राजनीतिक आधार कांग्रेस के पक्ष में रहा है, लेकिन भाजपा की संगठनात्मक मौजूदगी लगातार मजबूत रही है।

इस बार चुनाव में कौन-कौन से मुद्दे हावी रहेंगे? : Bhilai Municipal Corporation Elections

पानी, सड़क और नाली

भिलाई में चुनाव का सबसे बड़ा आधार अब भी रोजमर्रा की नागरिक सुविधाएं होंगी। पेयजल, नाली, सीवरेज, सड़क, स्ट्रीट लाइट और सफाई ऐसे मुद्दे हैं, जिनका सीधा असर मतदाता के घर तक पहुंचता है। 2026 में निगम प्रशासन ने खुर्सीपार क्षेत्र में सीवरेज, नाला सफाई, पेयजल और स्ट्रीट लाइट की समीक्षा भी की है।

कचरा और सफाई व्यवस्था

डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण के बावजूद कई क्षेत्रों में सफाई व्यवस्था चुनावी मुद्दा बनेगी। खासकर घनी आबादी वाले कैंप, खुर्सीपार, सुपेला और आसपास के क्षेत्रों में सफाई और नालियों की स्थिति सीधे चुनावी चर्चा में रहेगी।

निगम की आर्थिक स्थिति

करीब 800 करोड़ रुपये के 2026-27 बजट और विकास कार्यों के साथ निगम की वित्तीय क्षमता बड़ा मुद्दा है। 100 करोड़ रुपये के बॉन्ड प्रस्ताव के जमीन पर नहीं उतर पाने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

भ्रष्टाचार और प्रशासनिक टकराव

2026 में निगम की राजनीति में भ्रष्टाचार के आरोप और आयुक्त को लेकर विवाद भी बड़ा मुद्दा रहे। भाजपा पार्षदों ने करीब 12.66 करोड़ रुपये के पेवर ब्लॉक कार्यों में कथित अनियमितता के आरोप लगाए। कांग्रेस ने आरोपों को खारिज करते हुए जांच की मांग की। मार्च 2026 में सत्ता पक्ष और विपक्ष के पार्षदों ने निगम आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर एक साथ आवाज उठाई। यह घटना चुनाव में निगम बनाम प्रशासन की बहस को भी मुद्दा बना सकती है।

बीएसपी क्षेत्र और पटरी पार का अंतर : Bhilai Municipal Corporation Elections

भिलाई का चुनाव साधारण नगर निगम चुनाव नहीं है। यहां एक तरफ बीएसपी टाउनशिप की योजनाबद्ध बस्तियां हैं, तो दूसरी तरफ कैंप, खुर्सीपार, सुपेला, कोहका और आसपास के तेजी से बढ़ते क्षेत्र हैं। दोनों की नागरिक जरूरतें अलग हैं। टाउनशिप में सड़क, सीवरेज, पेयजल, स्ट्रीट लाइट और संपत्ति संबंधी मुद्दे प्रमुख होंगे। वहीं पटरी पार क्षेत्रों में सड़क, नाली, नियमितीकरण, अतिक्रमण, पानी, कचरा और ट्रैफिक ज्यादा प्रभावी मुद्दे बनेंगे।

कांग्रेस के सामने क्या चुनौती?

कांग्रेस के पास सबसे बड़ा लाभ निगम की मौजूदा सत्ता और 37 पार्षदों का पिछला आधार है। महापौर नीरज पाल भी सामान्य मुक्त वार्ड से दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन आरक्षण ने कांग्रेस के कई सक्रिय चेहरों को दूसरे वार्ड में जाने के लिए मजबूर कर दिया है। दूसरी चुनौती टिकट वितरण होगी। यदि पुराने पार्षद दूसरे वार्ड में जाते हैं तो वहां पहले से तैयारी कर रहे कांग्रेस नेताओं की दावेदारी कट सकती है। इससे बगावत और निर्दलीय उम्मीदवारों का खतरा बढ़ेगा।

भाजपा के सामने कैसा अवसर : Bhilai Municipal Corporation Elections

भाजपा के लिए सबसे बड़ा अवसर यह है कि प्रदेश में उसकी सरकार है और 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी का राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ा है। भिलाई में भी भाजपा लंबे समय से मजबूत संगठन और सक्रिय जमीनी नेताओं के जरिए कांग्रेस को चुनौती देती रही है।

आरक्षण ने कांग्रेस और भाजपा दोनों के पुराने समीकरण तोड़े हैं इसलिए भाजपा अगर टिकट वितरण में स्थानीय स्वीकार्यता, जातीय समीकरण और संगठनात्मक क्षमता को संतुलित करती है तो वह 2021 के 24 वार्डों से आगे बढ़ सकती है।

किसके कब्जे में जाएगा भिलाई निगम?

मौजूदा आंकड़ों पर कांग्रेस को हल्की बढ़त देना अधिक तर्कसंगत है, लेकिन इस बार मुकाबला 2021 की तुलना में कहीं अधिक कड़ा दिखाई देता है। कांग्रेस के पक्ष में तीन बड़े तथ्य हैं—निगम की मौजूदा सत्ता, 2021 में 37 पार्षदों की जीत और भिलाई में लंबे समय से मजबूत स्थानीय संगठन जबकि भाजपा के पक्ष में राज्य सरकार की सत्ता, मजबूत कैडर और कांग्रेस विरोधी वोट को एकजुट करने की संभावना है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि कौन-सी पार्टी आरक्षण से प्रभावित अपने पुराने नेताओं को बिना बगावत के नए वार्डों में एडजस्ट कर पाती है। यही टिकट वितरण चुनाव परिणाम की दिशा तय कर सकता है। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। खासकर 23 ओबीसी वार्ड और 19 महिला आरक्षित वार्डों में टिकट वितरण निर्णायक होगा।

महापौर की ओबीसी सीट बनेगी असली राजनीतिक परीक्षा

इस चुनाव में सबसे बड़ा सवाल पार्षद नहीं, महापौर का चेहरा होगा। कांग्रेस को ऐसा ओबीसी चेहरा चाहिए जो केवल किसी एक विधानसभा या गुट का नेता न हो, बल्कि पूरे भिलाई में स्वीकार्य हो। संगठन में पकड़, साफ छवि, वार्ड स्तर का जनसंपर्क और सभी सामाजिक वर्गों के बीच संवाद उसकी सबसे बड़ी पूंजी होगी।

Bhilai Municipal Corporation Elections
Bhilai Municipal Corporation Elections

भाजपा के लिए चुनौती इससे भी बड़ी है। उसे ऐसा ओबीसी चेहरा खोजना होगा जो कांग्रेस के पुराने शहरी नेटवर्क को चुनौती दे सके और भाजपा के संगठन को भी साथ लेकर चले। केवल जातीय समीकरण के आधार पर महापौर प्रत्याशी चुनना दोनों दलों के लिए जोखिम भरा होगा। ओबीसी पहचान के साथ लोकप्रियता, स्थानीय स्वीकार्यता, संगठन पर पकड़ और जीतने की क्षमता—इन चारों का संतुलन जरूरी होगा।

आरक्षण ने एक और बड़ा अवसर किया पैदा : Bhilai Municipal Corporation Elections

इस चुनाव में पहली बार नहीं, लेकिन इस स्तर पर बड़ी संख्या में नए चेहरों के लिए दरवाजा खुला है। 70 वार्डों में 19 महिला सीटें और 23 ओबीसी सीटें होने से कांग्रेस और भाजपा दोनों को कई पुराने राजनीतिक समीकरण छोड़कर नई सामाजिक और पीढ़ीगत टीम तैयार करनी होगी।

यही वजह है कि 2026 का भिलाई निगम चुनाव केवल कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं बल्कि पुराने चेहरे बनाम नए चेहरे, स्थानीय काम बनाम राजनीतिक संगठन, निगम के 25 साल के प्रदर्शन बनाम अगले पांच साल का विजन होगा और सबसे बढ़कर—आरक्षण से बदले राजनीतिक भूगोल में कौन अपनी नई जमीन सबसे तेजी से तैयार करता है। यही तय करेगा भिलाई निगम की अगली सत्ता की चाबी किसके हाथ होगी।

 

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