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Religiouseligious Freedom Case : गांवों में ईसाइयों पर प्रवेश रोक का बवंडर…! हाई कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा

By Newsdesk Admin
18/09/2025
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Religiouseligious Freedom Case
Religiouseligious Freedom Case

सीजी भास्कर, 18 सितंबर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने गांवों में ईसाइयों के प्रवेश पर लगाई जा रही होर्डिंग्स और पादरियों पर हमलों की बढ़ती शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार तथा संबंधित अधिकारियों से विस्तृत जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की डिवीजन बेंच ने कहा कि इस प्रकार के आरोपों की त्वरित जांच आवश्यक है और दो सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा पेश किया जाए। अदालत ने इस पूरे मसले को संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह मामला (Religious Freedom Case) गंभीर प्रभाव डालने वाला हो सकता है।

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में दलील दी कि कई गांवों में ग्राम सभाएं और स्थानीय नेतृत्व पादरियों तथा मतांतरित लोगों के विरुद्ध नोटिस बोर्ड लगा कर आदेश दे रहे हैं कि ये लोग गांव में प्रवेश न करें। शिकायतकर्ता ने यह भी बताया कि कई बार गांव के अपने ही ईसाई नागरिकों को उनके घरों में जाने से रोका गया तथा उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर प्रताड़ित किया गया। ऐसे घटनाक्रम से सामाजिक समरसता प्रभावित हो रही है और यह स्थिति (Religious Freedom Case) में निहित संवैधानिक प्रश्न उठाती है।

याचिकाकर्ता ने अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों में यह भी कहा कि ग्राम सभा नामक संस्थाएं पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 की आड़ लेकर परंपरा तथा रीति-रिवाजों का हवाला दे रही हैं, परंतु किसी भी परंपरा के नाम पर संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी ग्राम सभा ने किसी समुदाय के प्रवेश पर रोक लगाई है तो उस निर्णय का संवैधानिक परीक्षण होगा और वह निर्णय कानूनन चुनौती का सामना करेगा। इस संवैधानिक बहस की पृष्ठभूमि में यह मामला (Religious Freedom Case) अब न्यायिक विवेचना का विषय बन गया है।

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार, जिलाधिकारियों तथा संबंधित प्रशासनिक कार्यालयों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर ठोस जवाब और की गई कार्रवाई का ब्यौरा मांगा है। अदालत ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वह स्थानीय रिकॉर्ड, प्रशासनिक रिपोर्ट और स्वतंत्र गवाहों के बयान भी तलब कर सकती है। सुनवाई की अगली तारीख 13 अक्तूबर निर्धारित की गई है और तब तक सभी पक्ष अपना-अपना हलफनामा दाखिल करेंगे। यह प्रक्रिया (Religious Freedom Case) को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से सुलझाने में मदद करेगी।

याचिकाकर्ता के प्रतिनिधियों ने अदालत को बताया कि पहले भी संबंधित इलाके के विवादों पर याचिकाएं दाखिल की गई थीं पर तकनीकी कमियों के कारण वे खारिज हुईं। इस बार याचिकाकर्ता ने उचित पक्षकारों को शामिल कर और आवश्यक प्रमाण संलग्न कर पुनः याचिका दाखिल की है। न्यायालय ने राज्य प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि स्थानीय स्तर पर शांति कायम करने तथा प्रभावित परिवारों की सुरक्षा के त्वरित उपाय किए जाएँ अन्यथा कोर्ट निर्देशात्मक उपाय भी कर सकती है।

विशेषज्ञों का मत है कि ग्राम समितियों और पारंपरिक संस्थानों के अधिकारों का सम्मान करते हुए भी संवैधानिक सर्वोच्चता का पालन अनिवार्य है। यदि कोई परंपरा संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध हो तो उसे न्यायालय के समक्ष चुनौती का सामना करना होगा। उच्च न्यायालय के निर्देश राज्य प्रशासन के लिए चेतावनी हैं कि वे स्वतंत्रता और समानता सुनिश्चित करने हेतु प्रभावी कदम उठाएँ। यथासंभव अदालत ने आपसी समझ और शांति पर बल दिया है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है और उल्लंघन के मामलों में सख्त हस्तक्षेप किया जाएगा। यह दिशा (Religious Freedom Case) पर व्यापक प्रभाव डालेगी।

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