सीजी भास्कर, 20 सितंबर। चार दशकों से सशस्त्र आंदोलन चला रहे भाकपा (माओवादी) संगठन में पहली बार खुली फूट सामने आई है। हाल ही में (Maoist Ceasefire Announcement) संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य और केंद्रीय समिति के प्रवक्ता मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ अभय, भूपति, सोनू ने आधिकारिक पत्र जारी कर एक माह के संघर्ष विराम का ऐलान किया। इसके साथ ही उन्होंने शांति वार्ता का प्रस्ताव भी रखा और अपने व्यक्तिगत पत्र में स्वीकार किया कि हथियार उठाना संगठन की सबसे बड़ी भूल थी। इस स्वीकारोक्ति के साथ ही सोनू ने जनता से माफी भी मांगी।
लेकिन इस घोषणा ने संगठन के भीतर हलचल मचा दी। तेलंगाना स्टेट कमेटी ने तत्काल पत्र जारी कर इस प्रस्ताव को प्रवक्ता की निजी राय बताते हुए खारिज कर दिया। समिति के प्रतिनिधि जगन ने साफ कहा कि यह पार्टी का आधिकारिक निर्णय नहीं है, बल्कि इससे संगठन में अनावश्यक भ्रम और अस्थिरता फैल रही है। यह पहली बार है जब केंद्रीय समिति के प्रवक्ता की ओर से की गई घोषणा का अधीनस्थ इकाई ने सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराया है।
नेतृत्व संकट से जूझ रहा संगठन
विशेषज्ञ मानते हैं कि (Maoist Ceasefire Announcement) के इस दौर में संगठन लगातार नेतृत्व संकट से जूझ रहा है। 21 मई को सुरक्षा बलों की कार्रवाई में महासचिव समेत 28 कैडर मारे गए थे। इसके बाद जून से सितंबर के बीच केंद्रीय समिति के वरिष्ठ सदस्य उदय उर्फ गजरला रवि, मोडेम बालकृष्ण और झारखंड के प्रवेश सोरेन जैसे कई बड़े नेताओं को खोना पड़ा। वहीं, एक करोड़ रुपये की इनामी सदस्य सुजाता और कमलेश ने बीमारी और दबाव के चलते आत्मसमर्पण कर दिया। इन घटनाओं ने माओवादी संगठन की रीढ़ तोड़ दी है।
सरकार की नीति से बढ़ा दबाव
केंद्र सरकार ने पहले ही साफ कर दिया है कि मार्च 2026 तक माओवादी आंदोलन का पूरी तरह सफाया किया जाएगा। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान, गिरफ्तारी और सुरक्षा शिविरों की स्थापना का रोडमैप तैयार किया है। इसी पृष्ठभूमि में सोनू की ओर से संघर्ष विराम और वार्ता का प्रस्ताव सामने आया। कुछ सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने इस कदम को सकारात्मक बताया, लेकिन सरकार 2004 की वार्ता के अनुभव को देखते हुए किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है।
भविष्य पर गहरे सवाल
अधीनस्थ इकाई द्वारा खुले विरोध ने यह संकेत दे दिया है कि (Maoist Ceasefire Announcement) संगठन के भीतर गंभीर वैचारिक और रणनीतिक दरार पैदा हो चुकी है। कई जानकार मानते हैं कि अब संगठन की एकजुटता पहले जैसी नहीं रही। हथियारबंद संघर्ष जारी रखने या शांति प्रक्रिया अपनाने को लेकर गुटबाजी और तेज हो सकती है। स्थानीय लोग लंबे समय से हिंसा की समाप्ति की राह देख रहे हैं। उनका मानना है कि अगर संगठन शांति वार्ता के रास्ते पर आता है तो विकास और विश्वास का माहौल बन सकेगा। वहीं सुरक्षा बलों का कहना है कि अभियान पूरी ताकत से जारी रहेगा और (Maoist Ceasefire Announcement) के बावजूद सतर्कता बरती जाएगी।






