सीजी भास्कर, 25 अक्टूबर। ईओडब्ल्यू (EOW Case) के तीन अफसरों के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने और धारा 164 के बयान में छेड़छाड़ करने के आरोप पर शनिवार को सुनवाई हुई। कांग्रेस नेता गिरीश देवांगन की ओर से दायर याचिका इस मामले में कोर्ट में पेश की गई। रायपुर की सीनियर डिवीजन सिविल जज आकांक्षा बेक की अदालत में हुई सुनवाई में दोनों पक्षों ने अपनी दलीलें पेश कीं। अदालत ने कहा कि अब इस मामले में अधिकारियों की आपत्ति पर सुनवाई चार नवंबर को की जाएगी।
कोर्ट ने पहले ही नोटिस जारी कर अधिकारियों को जवाब मांगा था। गिरीश देवांगन ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि ईओडब्ल्यू (EOW Case) के अफसरों ने जांच के दौरान निखिल चंद्राकर के धारा 164 के बयान में हेराफेरी और फर्जीवाड़ा किया। शनिवार को दोनों पक्षों की दलीलों के बाद अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख चार नवंबर तय की।
ईओडब्ल्यू की ओर से पैरवी कर रहे वकील रवि शर्मा ने अदालत में कहा कि गिरीश देवांगन ने बिना किसी अनुमति या सैंक्शन के यह परिवाद दाखिल किया है। उन्होंने कहा कि शिकायत में कहा गया है कि निखिल चंद्राकर का बयान (164) सही ढंग से रिकॉर्ड नहीं हुआ, लेकिन कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया। साथ ही यह भी नहीं बताया गया कि किस कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय के अनुसार यदि कोई अधिकारी अपनी आफिशियल ड्यूटी के दौरान कार्य करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई से पहले सैंक्शन लेना अनिवार्य होता है। उन्होंने कहा कि यह पूरी शिकायत राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है और इसमें राज्य के कुछ बड़े नेताओं का नाम आने की संभावना थी। इसलिए इसे जांच को प्रभावित करने और प्रेस कांफ्रेंस के जरिए राजनीतिक माहौल बनाने के लिए दाखिल किया गया। यदि 164 के बयान में कोई त्रुटि होती भी है, तो उसका निर्णय वही कोर्ट करता है जहां बयान पेश किया गया। किसी अन्य अदालत को यह अधिकार नहीं है कि वह जांच करे कि बयान सही था या नहीं। उन्होंने कहा कि निखिल चंद्राकर ने खुद मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन दिया था, इसलिए पुलिस की भूमिका पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
वहीं गिरीश देवांगन की ओर से वकील फैजल रिजवी ने अदालत में कहा कि यह मामला केवल तकनीकी त्रुटि का नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक कृत्य का है। ईओडब्ल्यू (EOW Case) के अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने मिथ्या साक्ष्य तैयार किया, बोगस बयान कार्यालय में टाइप किया और उसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया। रिजवी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के विनोद पांडे प्रकरण का हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि यदि कोई एजेंसी झूठे साक्ष्य तैयार करती है, तो उस पर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि अब अदालत को यह तय करना है कि ईओडब्ल्यू अधिकारियों ने यह कार्य अपनी आफिशियल ड्यूटी में किया या आफ ड्यूटी। यदि यह जानबूझकर फर्जी साक्ष्य तैयार करने का मामला है, तो सैंक्शन का सवाल ही नहीं उठता। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने तर्क कोर्ट में पेश किए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई चार नवंबर के लिए स्थगित कर दी। इस पूरे प्रकरण में (EOW Case) को लेकर प्रदेश में कानूनी और राजनीतिक हलचल बढ़ गई है।


