सीजी भास्कर 16 नवंबर Integral Humanism India: दीनदयाल स्मृति व्याख्यान में धर्म और दर्शन पर विस्तृत दृष्टि
राजस्थान में आयोजित दीनदयाल स्मृति व्याख्यान कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि अगर एकात्म मानव दर्शन को किसी एक शब्द में समेटना हो, तो वह शब्द ‘धर्म’ है—पर वह धर्म नहीं जिसे लोग केवल मजहब या पंथ के रूप में देखते हैं, बल्कि वह धर्म जो जीवन, समाज और विश्व के व्यापक हित को समझने की क्षमता देता है।
उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने जिस विचार को नया नाम दिया, वह कोई नया सिद्धांत नहीं बल्कि सनातन विचार की ही आधुनिक अभिव्यक्ति है।
Integral Humanism India: 60 साल पुराना विचार आज भी क्यों प्रासंगिक?
भागवत ने कहा कि यह सोच—जिसे अब दुनिया Holistic Human Approach के नाम से समझने लगी है—आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी छह दशक पहले थी।
जीवनशैली बदली है, खान-पान बदला है, पर सनातन विचार का मूल नहीं बदला।
उन्होंने कहा कि सुख बाहर नहीं, भीतर होता है। जब मनुष्य अपने भीतर के सुख को पहचान लेता है, तब उसे पूरी दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्रतीत होती है और यही एकात्म की भावना है।
Integral Humanism India: अतिवाद नहीं, संतुलन—इसीमें है समाधान
संघ प्रमुख ने कहा कि इस दर्शन में किसी प्रकार का अतिवाद स्थान नहीं पाता।
विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें Mutual Welfare का भाव बना रहे—यानी सबके हित को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना।
उन्होंने कहा कि दुनिया ने आर्थिक उतार-चढ़ाव कई बार देखे हैं, पर भारत की मजबूती इस कारण बनी रहती है क्योंकि हमारे आर्थिक ढांचे की जड़ें परिवार व्यवस्था में हैं।
Integral Humanism India: विज्ञान ने सुविधा दी, लेकिन क्या मानसिक शांति भी बढ़ी?
भागवत ने कहा कि विज्ञान ने जीवन को आरामदायक जरूर बनाया है, लेकिन यह भी पूछना चाहिए—क्या इससे मन की शांति और संतोष बढ़ा है?
नई दवाइयां बनी हैं, पर नई बीमारियां भी आई हैं।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि दुनिया की केवल 4% आबादी 80% संसाधनों का उपभोग करती है, जो वैश्विक असंतुलन की बड़ी तस्वीर को उजागर करता है।
उन्होंने कहा कि यही असंतुलन इस दर्शन के महत्व को और बढ़ाता है।
Integral Humanism India: भारत में विविधता रही, लेकिन संघर्ष नहीं
भागवत ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता रही है।
यहां देवी-देवताओं की विभिन्न परंपराएं पहले भी थीं, और नई मान्यताएं जुड़ने से भी कोई टकराव नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि दुनिया शरीर, मन और बुद्धि के सुख को अलग-अलग समझती है, लेकिन इन्हें एक साथ कैसे संतुलित किया जाए—यह ज्ञान केवल भारत के पास है।
इसी संतुलन को Unified Human Vision कहा जा सकता है।




