सीजी भास्कर 12 दिसम्बर अंडमान–निकोबार के बेओदनाबाद में शुक्रवार का दिन इतिहास की एक और परत को फिर से छूने जैसा था, जब (Savarkar Statue Unveiling) कार्यक्रम के तहत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिमा का अनावरण किया।
कार्यक्रम के दौरान वातावरण में एक सहज-सी गंभीरता और भावनाओं की गर्माहट महसूस की जा सकती थी, खासकर तब जब प्रतिमा के निर्माणकर्ता मूर्तिकार अनिल सुतार को मोहन भागवत ने शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में हृदयनाथ मंगेशकर की भावुक स्मृतियाँ
अनावरण के बाद हुए सागर प्राण तलमलाला सांस्कृतिक कार्यक्रम में पद्मश्री पंडित हृदयनाथ मंगेशकर ने सावरकर से जुड़े अपने निजी अनुभव साझा किए।
उन्होंने बताया कि किस तरह वह किशोरावस्था में शिवाजी पार्क के पास सावरकर से पहली बार मिले थे और कैसे वही मुलाक़ात एक लंबे, आत्मीय रिश्ते में बदल गई।
उनका कहना था कि “मैं शायद वो इकलौता व्यक्ति हूं जो 22 साल तक उनके साथ रहा… उनके अंतिम क्षण भी मेरी आंखों के सामने थे।”
इस बयान के दौरान मंच पर एक अनोखी शांति और सम्मान का भाव था, जो पूरे कार्यक्रम के दौरान महसूस होता रहा।
अमित शाह सावरकर के गीत को करेंगे जारी, कार्यक्रमों की लड़ी आज भी जारी
प्रतिमा अनावरण के बाद अमित शाह का अगला पड़ाव था — स्थानीय प्रौद्योगिकी संस्थान में आयोजित एक और विशेष समारोह।
यहां वे सावरकर द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध गीत सागरा प्राण तळमळला के नये संस्करण को जारी करेंगे, जिसकी गूंज वर्षों से जनमानस में एक अलग ही छाप छोड़ती आई है।
दिलचस्प बात यह रही कि गुरुवार को ही शाह ने एक्स पर लिखे पोस्ट में सावरकर के योगदान को याद करते हुए कहा था कि वे उन चुनिंदा क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को “भौतिक और वैचारिक, दोनों धरातलों पर” गति दी।
सावरकर की ऐतिहासिक कैद—वही धरती, वही एहसास, 115 साल बाद सुनाई दी उनकी स्मृति
यह समारोह इसलिए भी खास था क्योंकि वही अंडमान, जिसे आज श्री विजयपुरम कहा जाता है, सावरकर की उन पीड़ादायक लेकिन अटूट हिम्मत के दिनों का साक्षी रहा है।
1911 में उन्हें जिस सेलुलर जेल में भेजा गया था, वहां की दीवारें अब भी अनगिनत कहानियों को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
गीत सागरा प्राण तळमळला, जिसे 115 साल पूरे होने पर फिर से याद किया जा रहा है, उस कठिन समय की ही एक भावनात्मक छाप माना जाता है—एक ऐसा दौर जहां संघर्ष, विचार और राष्ट्र के प्रति समर्पण एक ही रेखा में आ मिलते थे।






