सीजी भास्कर, 14 दिसंबर। रायपुर साहित्य उत्सव (Raipur Sahitya Utsav) ‘आदि से अनादि तक’ का आयोजन 23 जनवरी से 25 जनवरी 2026 तक नवा रायपुर में किया जाएगा। इस तीन दिवसीय साहित्यिक आयोजन को लेकर नांदगांव संस्कृति एवं साहित्य परिषद एवं साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद के संयुक्त तत्वावधान में राजनांदगांव प्रेस क्लब में एक विस्तृत परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और बौद्धिक परंपरा से जुड़े कई वरिष्ठ साहित्यकारों और विद्वानों ने अपने विचार रखे।
इस परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार सुशील कोठारी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। विशिष्ट अतिथि के रूप में पुरातत्वविद डॉ. आर.एन. विश्वकर्मा, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शंकर मुनि राय तथा चेयरमेन अध्ययन बोर्ड (मानविकी) सीएसवीटीयू डॉ. चंद्रशेखर शर्मा मौजूद रहे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, लेखक और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।
राजनांदगांव से और नाम जुड़ें, ऐसा कार्य करें : सुशील कोठारी
मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार सुशील कोठारी ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और हर कालखंड में समाज को दिशा देने का कार्य करता है। उन्होंने कहा कि राजनांदगांव की धरती गजानन माधव मुक्तिबोध, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी और बल्देव प्रसाद मिश्र जैसे महान साहित्यकारों की कर्मभूमि रही है। अब आवश्यकता है कि इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राजनांदगांव से और भी नाम देश के महान साहित्यकारों की श्रृंखला में जुड़ें।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में पढ़ने की आदत कम होती जा रही है, ऐसे में साहित्यिक आयोजनों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने दिग्विजय कॉलेज को साहित्यकारों की कर्मभूमि बताते हुए डॉ. मलय, डॉ. शरद गुप्ता, नंदुलाल चोटिया सहित कई वरिष्ठ साहित्यकारों का स्मरण किया।
साहित्य उत्सव से नई पीढ़ी जुड़ेगी साहित्य से : शशांक शर्मा
साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष शशांक शर्मा (Raipur Sahitya Utsav) ने कहा कि 23 से 25 जनवरी 2026 तक नवा रायपुर में आयोजित होने वाला रायपुर साहित्य उत्सव छत्तीसगढ़ की बौद्धिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त करेगा। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से मन झंकृत होता है और नए विचार पल्लवित होते हैं। साहित्य के माध्यम से ज्ञान का पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण होता है।
उन्होंने भारतीय श्रुति परंपरा, ब्रह्मनाद और क्वांटम सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्य सृष्टि की मूल चेतना से जुड़ा हुआ है। उन्होंने राजनांदगांव की भूमि को साहित्यिक दृष्टि से ईश्वर का वरदान बताते हुए कहा कि यहां विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट साहित्यकार हुए हैं। उन्होंने सभी साहित्यकारों से अपील की कि नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं।
साहित्य और संस्कृति से बनता है इतिहास : डॉ. आर.एन. विश्वकर्मा
पुरातत्वविद डॉ. आर.एन. विश्वकर्मा ने कहा कि किसी भी देश के इतिहास को समझने के लिए उसके साहित्य और संस्कृति को जानना आवश्यक है। साहित्य के माध्यम से ही किसी कालखंड के सुख-दुख, राग-द्वेष और सामाजिक परिस्थितियां अभिव्यक्त होती हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ में सातवाहन, पांडुवंश, कलचुरी और नागवंश कालीन अभिलेखों का उल्लेख करते हुए प्रदेश की समृद्ध साहित्यिक परंपरा पर प्रकाश डाला।
साहित्य मनुष्यता का बोध कराता है : डॉ. शंकर मुनि राय
हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शंकर मुनि राय ने कहा कि साहित्य मनुष्यता का बोध कराता है और यह सिखाता है कि मनुष्य, मनुष्य के लिए बना है। उन्होंने कहा कि राजनांदगांव में साहित्य की चौथी पीढ़ी सक्रिय है, जो इस शहर की जीवंत परंपरा का प्रमाण है। उन्होंने मुक्तिबोध, पदुमलाल बख्शी और बल्देव प्रसाद मिश्र के कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला और कहा कि साहित्य जोड़ने का माध्यम है, विभाजन का नहीं।
राजनांदगांव साहित्यकारों का शहर : डॉ. चंद्रशेखर शर्मा
चेयरमेन अध्ययन बोर्ड (मानविकी) सीएसवीटीयू डॉ. चंद्रशेखर शर्मा ने कहा कि राजनांदगांव साहित्यकारों का शहर है। यहां वाचिक परंपरा की गहरी जड़ें रही हैं। उन्होंने जिले के महान साहित्यकारों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि राजनांदगांव के कण-कण में सरस्वती का आशीर्वाद है। कार्यक्रम में अखिलेश चंद्र तिवारी, डॉ. वीरेंद्र बहादुर सिंह, अब्दुस्सा सलाम कौसर, डॉ. दादुलाल जोशी, शत्रुहन सिंह राजपूत, पद्मलोचन शर्मा, मुन्ना बाबू सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित रहे। मंच संचालन डॉ. सूर्यकांत मिश्रा ने किया।


