सीजी भास्कर, 13 जनवरी। मध्य पूर्व एक बार फिर उबाल पर है। ईरान के 31 प्रांतों में फैले सरकार-विरोधी प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया है और अब तक 572 लोगों की मौत की खबर सामने (Iran Protest Death Toll) आ चुकी है।
हालात इतने गंभीर हैं कि कई इलाकों में इंटरनेट और संचार सेवाएं बंद कर दी गई हैं। इसके बावजूद एक सवाल लगातार उठ रहा है—ईरान का सबसे बड़ा क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी सऊदी अरब आखिर क्यों चुप है? यह चुप्पी सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
जब रिश्ते दुश्मनी के चरम पर थे
करीब नौ साल पहले सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को “नया हिटलर” कहा था। यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंच पर काफी चर्चित रहा और दोनों देशों के रिश्ते उस वक्त सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे।
ईरान की ओर से भी तीखा जवाब दिया गया और सऊदी नेतृत्व का सार्वजनिक तौर पर मजाक उड़ाया गया। लेकिन 2023 के बाद तस्वीर बदलनी शुरू हुई।
चीन की मध्यस्थता और बदले समीकरण
चीन की पहल पर सऊदी अरब और ईरान ने अपने टूटे रिश्तों को दोबारा जोड़ने का फैसला किया। इसके तहत दोनों देशों ने एक-दूसरे की राजधानियों (Iran Protest Death Toll) में राजदूत भेजे।
रियाद ने अब्दुल्ला बिन सऊद अल-अनजी को तेहरान में अपना प्रतिनिधि बनाया, जबकि ईरान ने अली रजा एनायती को सऊदी अरब भेजा।
यहीं से सऊदी नीति में सार्वजनिक बयानबाजी की जगह “रणनीतिक चुप्पी” ने ले ली।
ईरान में क्या हालात हैं?
31 प्रांतों में सरकार-विरोधी प्रदर्शन
500 से ज्यादा हिंसक घटनाएं
अब तक 572 मौतों की पुष्टि
कई इलाकों में इंटरनेट और कॉलिंग बंद
Vision 2030: चुप्पी की सबसे बड़ी वजह
सऊदी अरब की खामोशी की जड़ें क्राउन प्रिंस के महत्वाकांक्षी Vision 2030 में छुपी हैं। इस योजना का मकसद सऊदी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को जमीन पर उतारना है।
रियाद को आशंका है कि अगर ईरान संकट में वह खुलकर किसी पक्ष में खड़ा होता है, तो पूरा क्षेत्र अस्थिर हो सकता है। ऐसी स्थिति विदेशी निवेशकों के भरोसे को गहरा झटका दे सकती है।
सरकार चुप, लेकिन मीडिया सक्रिय
हालांकि सऊदी सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सऊदी मीडिया पूरी तरह शांत नहीं है।
अल-अरबिया, अल-हदथ और अशरक अल-अवसत जैसे मीडिया संस्थान लगातार ईरान की स्थिति पर रिपोर्ट कर रहे हैं।
इन रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि प्रतिबंधों और संचार बंदी के बावजूद कुछ पत्रकार ईरानी नागरिकों से संपर्क कर हालात की जानकारी (Iran Protest Death Toll) बाहर ला रहे हैं।
लेबनान यात्रा पर क्यों चर्चा?
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की लेबनान यात्रा को सऊदी मीडिया ने खास तवज्जो दी। रिपोर्ट्स के मुताबिक बेरूत में उन्हें अपेक्षित स्वागत नहीं मिला और बैठकें तय समय से पहले खत्म हो गईं।
पर्दे के पीछे अमेरिका से तालमेल
सूत्रों के मुताबिक, रियाद और वॉशिंगटन के बीच ईरान को लेकर लगातार संवाद चल रहा है। सऊदी अरब फिलहाल उस अमेरिकी नीति से सहमत दिखता है, जिसमें हालात पर नजर रखी जा रही है, लेकिन सीधे हस्तक्षेप से बचा जा रहा है।
इसके अलावा मोहम्मद बिन सलमान अमेरिका को सीरिया और लेबनान से जुड़े सुझाव भी दे रहे हैं, जबकि जॉर्डन और मिस्र को इस चर्चा से जानबूझकर अलग रखा गया है।
चुप्पी कमजोरी नहीं, रणनीति है
ईरान संकट पर सऊदी अरब की खामोशी किसी डर या असमंजस का संकेत नहीं, बल्कि एक संतुलित और दीर्घकालिक रणनीति मानी जा रही है। रियाद इस वक्त हालात बिगाड़ने के बजाय इंतजार करना चाहता है—ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे, Vision 2030 पटरी से न उतरे और उसके रणनीतिक हित सुरक्षित रहें। मध्य पूर्व की राजनीति में कभी-कभी सबसे बड़ा बयान… चुप रहकर दिया जाता है।





