सीजी भास्कर, 04 मई : तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 (Tamil Nadu Election 2026) के नतीजों ने राज्य की पारंपरिक राजनीति को हिलाकर रख दिया है। दशकों से DMK और AIADMK के बीच सिमटी लड़ाई इस बार त्रिकोणीय हो गई, जिसमें Tamilaga Vettri Kazhagam और उसके नेता थलपति विजय ने जोरदार एंट्री कर दी।
शुरुआती रुझानों में TVK 100 के पार सीटों पर बढ़त बनाते हुए सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है, जबकि सत्ताधारी DMK अपेक्षा से काफी पीछे नजर आ रही है। 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है और मौजूदा ट्रेंड्स ने सत्ता समीकरण बदल दिए हैं।
DMK की रणनीति क्यों पड़ी भारी
मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन ने चुनाव अभियान (Tamil Nadu Election 2026) में ‘हिन्दी थोपने’ और ‘द्रविड़ पहचान’ को मुख्य मुद्दा बनाया। DMK ने केंद्र की भाषा नीति और कथित सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया। लेकिन इस बार यह रणनीति असरदार साबित नहीं हुई। विश्लेषकों का मानना है कि सिर्फ पहचान आधारित राजनीति से आगे बढ़कर मतदाता विकास, रोजगार और शासन जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
सनातन विवाद भी पड़ा भारी
उदयनिधि स्टालिन के 2023 में दिए गए सनातन धर्म संबंधी बयान ने देशभर में विवाद खड़ा कर दिया था। इस मुद्दे ने चुनाव में भी असर डाला और DMK की छवि को नुकसान पहुंचाया। कई मतदाताओं ने इसे लेकर नाराजगी जताई।
युवा और शहरी वोटरों का झुकाव बदला
इस बार उच्च मतदान प्रतिशत ने साफ संकेत दिया कि युवा और शहरी मतदाता बदलाव चाहते हैं। पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से हटकर उन्होंने नए विकल्प की तलाश की, जिसका फायदा थलपति विजय की पार्टी TVK को मिला।
विजय की एंट्री ने बदला खेल
TVK ने ‘तमिल गौरव’ के साथ-साथ भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और बदलाव के मुद्दे उठाए। पार्टी ने आक्रामक विरोध की बजाय संतुलित रुख अपनाया, जिससे मध्य वर्ग और युवा मतदाता तेजी से उसकी ओर आकर्षित हुए। अगर थलपति विजय सरकार बनाने में सफल होते हैं, तो यह तमिल सिनेमा से सीधे सत्ता तक का एक ऐतिहासिक सफर होगा और राज्य में ‘पोस्ट-द्रविड़ियन राजनीति’ की शुरुआत मानी जाएगी।


