सीजी भास्कर, 04 मई : पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जीत को केवल एक सामान्य चुनावी सफलता मानना शायद इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को कम करके आंकना होगा। यह परिणाम एक व्यापक राजनीतिक बदलाव का संकेत है। एक ऐसा बदलाव, जिसकी नींव काफी पहले रखी जा चुकी थी। इस बदलाव के केंद्र में हैं नरेंद्र मोदी (Narendra Modi ), जिनकी रणनीति, संदेश और लगातार प्रयासों ने बंगाल की राजनीति की दिशा बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।
बंगाल का चुनावी महासंग्राम अब अपने नतीजे तक पहुंच चुका है और यह स्पष्ट हो गया है कि राज्य की पारंपरिक राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना, जिसे दशकों तक केवल एक विचार के रूप में देखा जाता रहा, अब साकार होता नजर आ रहा है। भाजपा पहली बार पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची है और यह उपलब्धि किसी एक चुनावी अभियान का नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक राजनीतिक दृष्टि का परिणाम है।
पटना से कोलकाता तक, राजनीतिक गंगा का विस्तार
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें बिहार चुनाव के नतीजों के बाद की उस राजनीतिक पृष्ठभूमि को याद करना होगा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेत दिया था कि बिहार की जीत सिर्फ एक राज्य की जीत नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने ‘विकास की गंगा’ को बिहार से आगे बंगाल तक ले जाने की बात कही थी।
यह बयान केवल एक राजनीतिक रूपक नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट रोडमैप था। बिहार में एनडीए की मजबूती के बाद भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ा, लेकिन मोदी ने यह भी समझा कि बंगाल का राजनीतिक भूगोल और सामाजिक संरचना कहीं अधिक जटिल है। ऐसे में उन्होंने ‘भगीरथ प्रयास’ की तरह लगातार मेहनत करते हुए बंगाल को अपनी रणनीति के केंद्र में रखा।
‘अंग, बंग और कलिंग’ की रणनीति
प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में अक्सर ‘अंग, बंग और कलिंग’ का जिक्र सुनाई देता है। यह केवल सांस्कृतिक या ऐतिहासिक संदर्भ नहीं, बल्कि पूर्वी भारत के लिए भाजपा की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। ‘अंग’ यानी बिहार, ‘बंग’ यानी पश्चिम बंगाल और ‘कलिंग’ यानी ओडिशा—इन तीनों क्षेत्रों को जोड़कर भाजपा पूर्वी भारत में अपना मजबूत आधार तैयार करना चाहती है।
बिहार में पार्टी पहले ही मजबूत स्थिति में है, ओडिशा में भी उसने अपनी पकड़ बढ़ाई है, लेकिन बंगाल लंबे समय तक उसके लिए चुनौती बना रहा। यही कारण है कि मोदी ने बार-बार कहा कि जब तक बंगाल का विकास नहीं होगा, तब तक पूर्वी भारत का समग्र विकास अधूरा रहेगा।
अभूतपूर्व चुनावी अभियान
बंगाल चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी का चुनावी अभियान अभूतपूर्व रहा। उन्होंने राज्य के लगभग हर हिस्से में रैलियां और रोडशो किए—चाहे वह उत्तर बंगाल के चाय बागान हों या दक्षिण के सुंदरवन क्षेत्र। उनके अभियान में ‘विकास’ और ‘परिवर्तन’ दो मुख्य थीम रहे।
उन्होंने केंद्र सरकार की योजनाओं उज्ज्वला, पीएम-किसान, आयुष्मान भारत—का उल्लेख करते हुए यह बताने की कोशिश की कि इन योजनाओं का पूरा लाभ बंगाल के लोगों तक नहीं पहुंच पाया। उनका नारा “परिवर्तन चाहिए” सीधे तौर पर युवाओं, महिलाओं और मध्यम वर्ग से जुड़ता नजर आया।
‘बाहरी’ बनाम ‘अपना’ की राजनीति का जवाब
बंगाल की राजनीति में भाजपा को लंबे समय तक ‘बाहरी’ पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा। इस छवि को तोड़ने के लिए मोदी ने सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव पर खास ध्यान दिया। उन्होंने मंदिरों में दर्शन किए, स्थानीय परंपराओं से जुड़े और बंगाली भाषा में संवाद स्थापित किया।
इन प्रयासों ने यह संदेश देने में मदद की कि भाजपा केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के साथ भी खुद को जोड़ना चाहती है।
मुद्दों की धार और रणनीति का संतुलन
चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार पर भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर हमला बोला। हालांकि, उन्होंने अपने भाषणों में व्यक्तिगत हमलों से काफी हद तक दूरी बनाए रखी और ध्यान शासन व विकास पर केंद्रित रखा। यह रणनीति ‘एंटी-इंकंबेंसी’ को मजबूत करने के साथ-साथ ‘प्रो-गवर्नेंस’ की छवि बनाने में मददगार रही।
बंगाल: पूर्वोत्तर और एशिया का गेटवे
मोदी का विजन केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं था। उन्होंने बंगाल को पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक ‘गेटवे’ के रूप में विकसित करने की बात कही। उनका मानना है कि अगर भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनना है, तो बंगाल को फिर से औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र बनाना होगा।
एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत
4 मई के नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल की राजनीति अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगी। भारतीय जनता पार्टी ने यहां जो जगह बनाई है, वह एक स्थायी बदलाव का संकेत देती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘भगीरथ प्रयास’ जो बिहार से शुरू हुआ था—अब बंगाल तक पहुंच चुका है। यह केवल सीटों की जीत नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक और वैचारिक बदलाव की शुरुआत है।
आज बंगाल ने देश के सामने एक नई बहस खड़ी की है विकास बनाम अस्मिता, राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय राजनीति। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि यह ‘चुनावी गंगा’ विकास की धारा बनकर कितनी दूर तक जाती है, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि बंगाल ने भारतीय राजनीति की दिशा को नया मोड़ दे दिया है।


