सीजी भास्कर, 13 जनवरी। वर्षों तक “धान का कटोरा” कहलाने वाला छत्तीसगढ़ अब खेती के एक नए युग की ओर कदम बढ़ा चुका है। एक समय था जब राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Krishak Unnati Yojana 2.0) पूरी तरह धान पर निर्भर थी, लेकिन बदलते हालात – जल संकट, मिट्टी की गिरती उर्वरता और बढ़ती लागत—ने यह साफ कर दिया कि केवल एक फसल पर टिके रहना किसानों के लिए घाटे का सौदा है। ऐसे दौर में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में शुरू हुई कृषक उन्नति योजना 2.0 ने खेती की दिशा ही बदल दी है।
यह योजना सिर्फ आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की कृषि नीति में आए वैचारिक बदलाव का संकेत है। धान से आगे बढ़कर अब किसान दलहन, तिलहन और अन्य वैकल्पिक फसलों को अपना रहे हैं, जिससे न केवल आय बढ़ रही है बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी कम हो रहा है।
धान की खेती पर अत्यधिक जल निर्भरता, रासायनिक खादों का बढ़ता उपयोग और एक ही फसल पर निर्भरता लंबे समय से किसानों के लिए चुनौती बनी हुई थी। साय सरकार ने समय रहते यह समझ लिया कि खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाना है तो फसल विविधीकरण अनिवार्य है—और यही सोच कृषक उन्नति योजना 2.0 की नींव बनी।
कृषक उन्नति योजना 2.0: सहायता नहीं, नई सोच
इस योजना के तहत किसानों को फसल के प्रकार के अनुसार प्रति एकड़ 10,000 से 15,351 रुपये तक की सहायता दी जा रही है। बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी जैसी जरूरतों में यह राशि किसानों के लिए संबल बनी है। सबसे अहम बात यह कि यह मदद डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए सीधे किसानों के खातों में पहुंच रही है, जिससे पारदर्शिता बनी है और बिचौलियों की भूमिका खत्म हुई है।
DBT से मजबूत हुआ भरोसा
मार्च 2024 में योजना के पहले चरण में 24.72 लाख किसानों को लगभग 13,320 करोड़ रुपये की राशि DBT के माध्यम से मिली। इसका असर गांवों में साफ दिखने लगा है—खरीदारी बढ़ी (Krishak Unnati Yojana 2.0) है, स्थानीय बाजारों में रौनक लौटी है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिली है। सरकारी तंत्र पर किसानों का भरोसा मजबूत हुआ है।
दलहन–तिलहन की ओर बढ़ता कदम
कृषक उन्नति योजना 2.0 का सबसे सकारात्मक असर यह है कि किसान अब अरहर, चना, मसूर जैसी दलहन और सरसों, सोयाबीन, मूंगफली जैसी तिलहन फसलों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। कम लागत, कम पानी की जरूरत, बेहतर मुनाफा और MSP पर खरीदी की गारंटी ने इस बदलाव को मजबूती दी है।
MSP और केंद्र–राज्य समन्वय
दलहन और तिलहन की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी के लिए केंद्र सरकार के सहयोग से राज्य को 425 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिलना किसानों के लिए बड़ी राहत साबित हुआ है। PM-AASHA जैसी योजनाओं के साथ तालमेल किसानों को बाजार के उतार–चढ़ाव से सुरक्षा दे रहा है।
मिट्टी, पानी और पर्यावरण को लाभ
दलहन फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती हैं, कम सिंचाई में तैयार होती हैं और रासायनिक खादों की जरूरत घटाती हैं। इससे जल संरक्षण, मिट्टी की सेहत और पर्यावरण संतुलन को सीधा लाभ मिल रहा है। खेती अब आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित बन रही है।
किसानों की सोच में बदलाव
अब किसान केवल सहायता पर निर्भर नहीं हैं। वे बाजार को समझ रहे हैं, नई तकनीक अपना (Krishak Unnati Yojana 2.0) रहे हैं और जोखिम प्रबंधन के साथ खेती कर रहे हैं। यह बदलाव किसी कृषि क्रांति से कम नहीं।
मुख्यमंत्री का विज़न
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का स्पष्ट संदेश है – “यह योजना मदद नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के कृषि विकास मॉडल की नींव है। किसान मजबूत होगा, तभी राज्य मजबूत होगा।”
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार
कृषक उन्नति योजना 2.0 का असर खेतों से निकलकर गांवों तक पहुंच चुका है। कृषि आधारित रोजगार बढ़े हैं, छोटे उद्योगों को बल मिला है, पलायन पर रोक लगी है और ग्रामीण छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है।
समग्र रूप से देखा जाए तो कृषक उन्नति योजना 2.0 छत्तीसगढ़ को एक–फसली निर्भरता से बाहर निकालकर बहुफसली, टिकाऊ और लाभकारी कृषि मॉडल की ओर ले जा रही है। आने वाले वर्षों में यह योजना राज्य को देश के अग्रणी कृषि मॉडल राज्यों की कतार में खड़ा करने की पूरी क्षमता रखती है।



