छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नए बस स्टैंड के पीछे बनी अस्थायी बस्ती पर प्रशासन ने दो दिन तक लगातार कार्रवाई की। (Bijapur Encroachment Action) के तहत करीब 120 मकानों को अवैध अतिक्रमण मानते हुए ध्वस्त कर दिया गया, जिसके बाद इलाके में तनाव जैसी स्थिति बन गई।
उजड़े परिवारों ने खुद को माओवादी पीड़ित बताया
कार्रवाई के बाद लगभग 20 परिवार सामने आए और उन्होंने दावा किया कि वे माओवादी हिंसा से जान बचाकर अपने मूल गांव छोड़कर शहर पहुंचे थे। प्रभावित परिवारों का कहना है कि बिना पूर्व सूचना के उनके घर गिरा दिए गए, जिससे ठंड के मौसम में वे खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए।
गांवों से आकर बनी थी अस्थायी बसाहट
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस बस्ती में चिन्नाकवाली, कांदुलनार, पेद्दाजोजेर और मोदकपाल जैसे अंदरूनी इलाकों से आए परिवार रह रहे थे। कई वर्षों से यहां रह रहे लोगों का कहना है कि उन्होंने मजदूरी और छोटे कामों के सहारे अपनी जिंदगी दोबारा खड़ी की थी।
सुरक्षा बलों से जुड़े परिवारों का दावा भी चर्चा में
इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब यह दावा सामने आया कि ध्वस्त किए गए मकानों में से कुछ घर जिला रिजर्व गार्ड से जुड़े जवानों के परिवारों के भी थे। बताया जा रहा है कि इन परिवारों के सदस्य माओवादी विरोधी अभियानों में तैनात हैं, जिसके बाद राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रिया देखी गई।
प्रशासन ने दावों को किया खारिज
प्रशासन ने माओवादी पीड़ित होने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जिन परिवारों की पहचान पहले से माओवादी हिंसा से प्रभावित के रूप में हुई थी, उन्हें शांतिनगर क्षेत्र में पुनर्वासित किया जा चुका है। जहां कार्रवाई हुई, वहां नया और अवैध अतिक्रमण पाया गया।
जांच में मिले अन्य ठिकानों के सबूत
अधिकारियों के अनुसार, सत्यापन के दौरान सामने आया कि कुछ लोगों के अन्य स्थानों पर भी मकान हैं और कुछ मामलों में जमीन बेचने के रिकॉर्ड भी मिले हैं। प्रशासन का कहना है कि बिना ठोस दस्तावेज और प्रमाण के किसी को माओवादी पीड़ित नहीं माना जा सकता।
पात्रों को मिलेगा पुनर्वास का लाभ
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई परिवार वास्तव में माओवादी हिंसा से प्रभावित है और अब तक लाभ से वंचित रहा है, तो आवेदन के बाद उसकी जांच कर पुनर्वास नीति के तहत सहायता दी जा सकती है। राज्य की नीति में आवास, आर्थिक मदद, शिक्षा और आजीविका से जोड़ने का प्रावधान है।




