छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने (Child Custody Case Verdict) में यह साफ किया है कि बच्चों की कस्टडी तय करते समय अदालत माता-पिता के अधिकारों से पहले बच्चे के मानसिक और भावनात्मक हित को देखती है। कोर्ट ने कहा कि कस्टडी का फैसला केवल कानून नहीं, बल्कि संवेदनशील मानवीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
सौतेली मां से समान स्नेह की गारंटी नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि जिस घर में सगी मां की जगह सौतेली मां होती है, वहां बच्चे को वही भावनात्मक सुरक्षा और अपनापन मिलना सुनिश्चित नहीं होता। (Child Custody Case Verdict) में कोर्ट ने माना कि बच्चे के कोमल मन पर पारिवारिक माहौल का गहरा असर पड़ता है।
बेहतर कमाई कस्टडी का आधार नहीं
पिता की ओर से यह तर्क दिया गया कि वह आर्थिक रूप से सक्षम हैं और बेटे को बेहतर सुविधाएं दे सकते हैं। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ धन और सुविधाएं बच्चे के संपूर्ण विकास की कसौटी नहीं हो सकतीं। भावनात्मक स्थिरता और सुरक्षित माहौल को अधिक अहम माना गया।
बिना तलाक दूसरा विवाह बना बड़ा कारण
मामले की सुनवाई में यह तथ्य सामने आया कि पिता ने पहली पत्नी से तलाक लिए बिना दूसरी महिला से विवाह कर लिया था। कोर्ट ने इसे बच्चे के भविष्य से जुड़ा गंभीर पहलू मानते हुए कहा कि ऐसे हालात में कस्टडी देना बच्चे के हित में नहीं माना जा सकता।
फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पहले के आदेश को सही ठहराते हुए पिता की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने सभी तथ्यों और परिस्थितियों का सही मूल्यांकन किया था और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है कस्टडी
अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि बच्चे की कस्टडी माता-पिता का अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। (Child Custody Case Verdict) के अनुसार, हर मामले में यह देखा जाएगा कि बच्चा किसके साथ ज्यादा सुरक्षित, संतुलित और खुश रह सकता है।




