सीजी भास्कर, 27 जनवरी | छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से सामने आए Bedroom CCTV Divorce Case Chhattisgarh ने वैवाहिक रिश्तों की निजता और कानूनी सबूतों की सीमाओं पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। पति-पत्नी के बीच चले आ रहे इस विवाद में अब हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले पर दोबारा विचार करने का आदेश दिया है।
पत्नी का आरोप: बेडरूम में निगरानी, निजता का उल्लंघन
मामले में पत्नी का कहना है कि तमनार में साथ रहने के दौरान पति ने बिना जानकारी दिए बेडरूम में सीसीटीवी कैमरा लगवाया। महिला के अनुसार, इस निगरानी से उसका मानसिक उत्पीड़न हुआ और विरोध करने पर उसे धमकाया भी गया। इसी आधार पर महिला ने तमनार थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।
पति का दावा: आपत्तिजनक गतिविधियों के सबूत के तौर पर CCTV
दूसरी ओर, पति ने अदालत में आरोप लगाया कि उसकी पत्नी अन्य पुरुषों के साथ अश्लील चैटिंग और न्यूड वीडियो कॉल करती थी। पति का कहना है कि इन्हीं गतिविधियों को प्रमाणित करने के लिए कमरे में कैमरे लगाए गए थे। यह विवाद आगे चलकर Bedroom CCTV Divorce Case Chhattisgarh के रूप में हाईकोर्ट तक पहुंचा।
फैमिली कोर्ट का फैसला: तकनीकी आधार पर सबूत खारिज
महासमुंद फैमिली कोर्ट ने पति द्वारा पेश किए गए सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया था। कोर्ट का तर्क था कि इलेक्ट्रॉनिक सबूत के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B का प्रमाणपत्र अनिवार्य है, जो प्रस्तुत नहीं किया गया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी: फैमिली कोर्ट को है व्यापक अधिकार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 14 और 20 के तहत अदालत विवाद के प्रभावी निपटारे के लिए तकनीकी सीमाओं से परे जाकर साक्ष्यों पर विचार कर सकती है। इसी आधार पर Bedroom CCTV Divorce Case Chhattisgarh में दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए गए हैं।
छह साल पुराना विवाद, अब नए मोड़ पर
साल 2012 में हुई शादी के बाद शुरू हुआ यह वैवाहिक विवाद अब कानूनी मिसाल की ओर बढ़ता दिख रहा है। हाईकोर्ट के इस रुख से यह तय होना बाकी है कि निजी स्थानों में रिकॉर्ड किए गए डिजिटल सबूतों की कानूनी वैधता किस हद तक मानी जा सकती है।





