सीजी भास्कर, 06 फरवरी। कानून का सहारा गलत नीयत से लिया जाए, तो वह न्याय की जगह अन्याय का रास्ता (Bilaspur High Court Judgment) भी बन सकता है। ऐसे ही एक मामले में हाई कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि दो बालिगों के बीच वर्षों तक सहमति से चला संबंध, केवल इसलिए दुष्कर्म नहीं माना जा सकता क्योंकि बाद में रिश्ता टूट गया। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दाखिल चार्जशीट को रद्द कर दिया है।
Bilaspur High Court में दुष्कर्म के आरोप में फंसे एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए अरविंद कुमार वर्मा की सिंगल बेंच ने यह अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि इस मामले में आपराधिक कार्रवाई को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
क्या था पूरा मामला
भिलाई निवासी एक महिला ने मार्च 2020 में शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ दुष्कर्म किया। शिकायत में कहा गया कि आरोपी वर्ष 2005 से उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता (Bilaspur High Court Judgment) रहा और विरोध करने पर उसे नुकसान पहुंचाने की धमकी देता था। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म और धमकी की धाराओं में अपराध दर्ज कर चार्जशीट ट्रायल कोर्ट में पेश की थी।
पुलिस कार्रवाई को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से लंबे समय तक चला और इसे जबरन या धोखे से जोड़ना गलत है।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महिला के बयान और रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए कहा कि वह खुद यह स्वीकार करती है कि उसे आरोपी की सामाजिक स्थिति, जाति का अंतर और वैवाहिक हालात की पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद उसने वर्षों तक संबंध बनाए रखे और इस दौरान कभी किसी प्रकार की शिकायत दर्ज नहीं कराई।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक सहमति से बने रिश्ते में बाद में शादी का वादा पूरा न होना, अपने आप में दुष्कर्म का अपराध नहीं बनाता। यदि हर असफल रिश्ते को आपराधिक रंग दिया जाए, तो यह कानून की मूल भावना के विपरीत होगा।
चार्जशीट रद्द
सिंगल बेंच ने अपने फैसले में लिखा कि लगभग 15 वर्षों तक चले संबंध, नियमित मुलाकातें, स्वेच्छा से शारीरिक संबंध और शिकायत में देरी यह दर्शाती है कि रिश्ता सहमति पर आधारित (Bilaspur High Court Judgment) था। ऐसे में केवल रिश्ता खत्म होने के आधार पर रेप का आरोप टिकाऊ नहीं है। इन आधारों पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दायर आरोप पत्र को रद्द कर दिया।
यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, जहां सहमति से चले रिश्तों को बाद में आपराधिक रूप देने की कोशिश की जाती है।




