भारत माला परियोजना के तहत भूमि अधिग्रहण में सामने आए 43 करोड़ रुपए के कथित घोटाले में फरार चल रहे दो राजस्व अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। आरोपियों में तत्कालीन तहसीलदार शशिकांत कुर्रे और नायब तहसीलदार लखेश्वर प्रसाद किरण शामिल हैं। दोनों को अदालत में पेश करने के बाद पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है। यह मामला अब औपचारिक रूप से Bharatmala Compensation Scam के रूप में दर्ज है।
एक जमीन, 80 मालिक
जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपियों ने अधीनस्थ कर्मचारियों और कथित भू-माफिया के साथ मिलकर कूटरचित दस्तावेज तैयार किए। एक ही जमीन को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित कर 159 खसरों में दर्ज किया गया और करीब 80 नए नाम जोड़ दिए गए। इस पूरे प्रकरण को Fake Land Ownership Case माना जा रहा है, जिसमें वास्तविक स्वामित्व से कहीं अधिक दावे प्रस्तुत किए गए।
मुआवजा राशि कई गुना बढ़ाई गई
जांच में सामने आया है कि 559 मीटर भूमि की वास्तविक कीमत लगभग 29.5 करोड़ रुपए आंकी गई थी, लेकिन दस्तावेजों में इसे 70 करोड़ रुपए से अधिक दर्शाया गया। अभनपुर बेल्ट में 9.38 किलोमीटर क्षेत्र के लिए कुल 324 करोड़ रुपए मुआवजा निर्धारित किया गया था, जिसमें से 246 करोड़ का भुगतान हो चुका है और 78 करोड़ रोक दिया गया है। इसे व्यापक Land Acquisition Fraud के रूप में देखा जा रहा है।
8000 पन्नों का चालान पेश
आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले में 12 बंडलों में लगभग 8000 पन्नों का चालान विशेष न्यायालय में प्रस्तुत किया है। कुल 10 आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज है। जांच में तकनीकी दस्तावेज, मोबाइल चैट, बैंक लेनदेन और गवाहों के बयान शामिल किए गए हैं। कुछ खातों में करोड़ों रुपए के संदिग्ध ट्रांसफर के साक्ष्य भी सामने आए हैं। यह पूरा घटनाक्रम EOW Investigation Update के तहत आगे बढ़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, संपत्ति कुर्की पर विचार
दोनों अधिकारियों ने उच्चतम न्यायालय में जमानत याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। विशेष न्यायालय ने स्थायी गिरफ्तारी वारंट और उद्घोषणा जारी की थी। आरोपियों की संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया भी न्यायिक विचाराधीन है।
परियोजना की पारदर्शिता पर उठे सवाल
भारत माला परियोजना केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी सड़क योजना है, जिसके तहत हजारों किलोमीटर आर्थिक कॉरिडोर विकसित किए जा रहे हैं। रायपुर-विशाखापट्टनम कॉरिडोर इसी का हिस्सा है। इस घोटाले ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया की पारदर्शिता और निगरानी तंत्र पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।




