सीजी भास्कर, 17 फरवरी। चुनावी विज्ञापन को लेकर चले कानूनी विवाद में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को कर्नाटक हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनके खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि याचिका को खारिज करते (Rahul Gandhi Defamation Case Karnataka) हुए कहा कि इस प्रकरण की सुनवाई जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
यह मामला विधानसभा चुनाव के दौरान प्रकाशित तथाकथित ‘भ्रष्टाचार रेट कार्ड’ विज्ञापन से जुड़ा था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि विज्ञापन के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी की छवि धूमिल करने की कोशिश की गई और पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली सरकार पर “40 प्रतिशत कमीशन” लेने जैसे आरोप लगाए गए। यह विज्ञापन 5 मई 2023 को प्रमुख अखबारों में पूरे पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था और बाद में सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी साझा किया गया।
न्यायमूर्ति सुनील दत्त यादव की पीठ ने आदेश में कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को आपराधिक मुकदमे में बदलना उचित नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि व्यक्तिगत भूमिका का स्पष्ट प्रमाण न हो।
यह शिकायत भाजपा नेता केशव प्रसाद की ओर से दायर की गई थी, जिसमें राहुल गांधी के साथ-साथ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार को भी आरोपी बनाया (Rahul Gandhi Defamation Case Karnataka) गया था। आरोप था कि विज्ञापन झूठे तथ्यों पर आधारित था और इसे सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया गया।
राहुल गांधी की ओर से दलील दी गई कि शिकायतकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि विज्ञापन उनके सीधे निर्देश पर जारी हुआ या उन्होंने स्वयं उसे प्रसारित किया। बचाव पक्ष ने कहा कि राजनीतिक अभियानों में प्रकाशित सामग्री के लिए व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व तय करने के लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक होते हैं, जो इस मामले में अनुपस्थित हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला चुनावी प्रचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण संकेत (Rahul Gandhi Defamation Case Karnataka) देता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक मंच का उपयोग राजनीतिक विवादों के निपटारे के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। फिलहाल इस निर्णय के साथ राहुल गांधी से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई है, हालांकि राजनीतिक विमर्श में यह मुद्दा चर्चा का विषय बना रह सकता है।





