वॉशिंगटन/तेहरान। ईरान और इजराइल के बीच जारी तनावपूर्ण संघर्ष के बीच अचानक युद्धविराम को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसकी वजह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया सोशल मीडिया पोस्ट मानी जा रही है। ट्रंप ने अपने संदेश में ईरान से “बिना शर्त सरेंडर” की मांग दोहराई है, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि आने वाले दिनों में किसी बड़े कूटनीतिक कदम की घोषणा हो सकती है। फिलहाल वैश्विक राजनीतिक हलकों में (Iran Israel Ceasefire) को लेकर चर्चाएं तेजी से फैल रही हैं।
पिछले साल के पैटर्न से जोड़ी जा रही तुलना
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा स्थिति की तुलना पिछले साल हुए संघर्ष से की जा रही है। उस समय भी लगभग 12 दिन तक चले तनाव के दौरान ट्रंप ने इसी तरह की एक पोस्ट साझा की थी, जिसमें बिना शर्त सरेंडर की बात कही गई थी। उसके कुछ दिन बाद दोनों देशों के बीच युद्धविराम की घोषणा कर दी गई थी। यही वजह है कि अब कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि वही घटनाक्रम दोहराया गया, तो 12 मार्च के आसपास किसी प्रकार की घोषणा संभव हो सकती है। इस पूरे घटनाक्रम को अब (Middle East Conflict) के संदर्भ में देखा जा रहा है।
ट्रंप ने पोस्ट में रखी सख्त शर्त
अपने हालिया संदेश में ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईरान के साथ किसी भी प्रकार का समझौता तभी संभव है, जब वह बिना शर्त आत्मसमर्पण के लिए तैयार हो। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में यदि स्वीकार्य नेतृत्व सामने आता है तो अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान की अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूत बनाने में सहयोग कर सकते हैं। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में (Donald Trump Statement) को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
मौजूदा संघर्ष पहले से ज्यादा गंभीर
हालांकि जानकारों का मानना है कि इस बार की स्थिति पिछले साल की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल और गंभीर है। मौजूदा संघर्ष कई देशों को प्रभावित कर चुका है और खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति पर भी इसका असर पड़ा है। इसके अलावा क्षेत्र में कई सैन्य घटनाओं और शीर्ष नेतृत्व से जुड़े घटनाक्रमों ने तनाव को और बढ़ा दिया है। इसी कारण विशेषज्ञ इसे व्यापक (Iran Israel War) के रूप में देख रहे हैं।
ईरान की ओर से नरमी के संकेत नहीं
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने भी हालिया बयान में स्पष्ट किया है कि उनका देश फिलहाल किसी दबाव में आकर युद्ध रोकने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता करने वाले देशों को पहले उन ताकतों पर दबाव बनाना चाहिए, जिन्होंने ईरानी जनता को कमजोर समझकर संघर्ष शुरू किया। इस बयान से यह साफ संकेत मिलता है कि दोनों पक्षों के बीच अभी भी कूटनीतिक दूरी बनी हुई है।
मध्यस्थता को लेकर भी स्थिति अस्पष्ट
पिछली बार संघर्ष को रोकने में कतर की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी, लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग बताई जा रही हैं। हाल के हमलों के कारण कतर की रास लफान गैस सुविधा प्रभावित हुई है और उसने एलएनजी निर्यात पर फोर्स मेज्योर घोषित कर दिया है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि वह फिर से मध्यस्थता की भूमिका निभा पाएगा या नहीं। फिलहाल दुनिया की नजर आने वाले दिनों में होने वाली कूटनीतिक गतिविधियों पर टिकी हुई है।





