सीजी भास्कर, 11 मार्च। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेसिया (इच्छा मृत्यु) की अनुमति (Supreme Court Passive Euthanasia India) दे दी है। करीब 13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े हरीश राणा के मामले में अदालत ने यह फैसला सुनाया। इसे भारत में पैसिव यूथेनेसिया से जुड़े अहम मामलों में से एक माना जा रहा है।
अदालत ने निर्देश दिया है कि हरीश राणा को AIIMS के पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती कराया जाए, जहां चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत उनका इलाज धीरे-धीरे वापस लिया जाएगा।
‘उसे अपार पीड़ा में नहीं रख सकते’ – सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह फैसला बेहद कठिन है, लेकिन मरीज की गरिमा (डिग्निटी) के साथ जीवन समाप्त करने की प्रक्रिया सुनिश्चित की जानी चाहिए। न्यायमूर्ति पारदीवाला ने पिछली सुनवाई में कहा था कि मामले की रिपोर्ट बेहद दुखद है और अदालत किसी व्यक्ति को अनंत पीड़ा में नहीं रख सकती।
2013 में हादसे के बाद से कोमा में
जानकारी के अनुसार, हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उनके सिर में गंभीर चोटें आईं और तभी से वे अचेत (Supreme Court Passive Euthanasia India) अवस्था में हैं। लगातार बिस्तर पर रहने की वजह से उनके शरीर पर कई घाव भी हो गए हैं और उनकी हालत में सुधार की कोई उम्मीद नहीं बताई गई है।
माता-पिता ने ही कोर्ट से की थी मांग
हरीश राणा 100 प्रतिशत दिव्यांगता की स्थिति में हैं और डॉक्टरों के मुताबिक उनके ठीक होने की संभावना (Supreme Court Passive Euthanasia India) नहीं है। ऐसे में उनके माता-पिता ने ही सुप्रीम कोर्ट से इच्छा मृत्यु की अनुमति देने की मांग की थी। एम्स की मेडिकल रिपोर्ट में भी उनके स्वस्थ होने की संभावना न के बराबर बताई गई थी।





