नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में पारित ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 कानूनी विवादों के घेरे में आ गया है। इस संशोधित कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नए प्रावधान संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों और मानवीय गरिमा का उल्लंघन करते हैं।
मुख्य विवाद: ‘धारा 2(के)’ और आत्म-निर्धारण का अधिकार
याचिका में मुख्य रूप से 2019 के मूल कानून की धारा 2(के) में किए गए संशोधनों को निशाना बनाया गया है।
- पहले की स्थिति: 2019 के कानून और ‘नालसा’ (NALSA) बनाम भारत संघ मामले के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, लिंग पहचान को व्यक्ति के निजी अनुभव और ‘स्व-पहचान’ (Self-Identification) पर आधारित माना गया था।
- संशोधन के बाद: 2026 के नए प्रावधानों में लिंग निर्धारण को सामाजिक-सांस्कृतिक और चिकित्सकीय मानकों (Medical Standards) से जोड़ दिया गया है।
- याचिका का तर्क: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी व्यक्ति की पहचान को प्रमाणित करने के लिए बाहरी चिकित्सकीय जांच या सामाजिक मापदंड थोपना निजता के अधिकार और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता: लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और जैनब पटेल
यह याचिका राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद की प्रमुख सदस्य और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी व जैनब पटेल द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है।
- दावा: याचिका में कहा गया है कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को “गंभीर और अपूरणीय क्षति” पहुंचाता है।
- परामर्श का अभाव: आरोप है कि कानून में इतने बड़े बदलाव करने से पहले वास्तविक हितधारकों (Stakeholders) और ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधियों से कोई ठोस चर्चा या परामर्श नहीं किया गया।
परिषद के भीतर और बाहर बढ़ता विरोध
संशोधन के बाद से ही देश भर के LGBTQIA+ समुदायों में गहरा असंतोष देखा जा रहा है।
- इस्तीफे: राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद के कई सदस्यों ने इन नए प्रावधानों के विरोध में अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। उनका तर्क है कि ये नियम समुदाय की स्वायत्तता को खत्म कर उन्हें फिर से नौकरशाही और चिकित्सा जगत के अधीन कर देंगे।
- विरोध प्रदर्शन: दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु सहित कई शहरों में सामाजिक संगठनों ने संशोधन को “प्रतिगामी” (Regressive) बताते हुए प्रदर्शन किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट से उम्मीदें
मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत के पाले में है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में ‘नालसा’ फैसले की फिर से व्याख्या कर सकता है। अदालत को यह तय करना होगा कि क्या राज्य के पास किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान को प्रमाणित करने के लिए ‘मेडिकल बोर्ड’ जैसे मानक तय करने का अधिकार है, या यह पूरी तरह से व्यक्ति की आंतरिक चेतना का विषय है।
प्रमुख बिंदु: संशोधन 2026 बनाम मूल कानून 2019
| विषय | मूल कानून (2019) | संशोधन (2026) |
| पहचान का आधार | स्व-अनुभव और आत्म-निर्धारण। | चिकित्सकीय एवं सामाजिक प्रमाण अनिवार्य। |
| प्रमाणन प्रक्रिया | जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी प्रमाण पत्र। | विशेषज्ञों की समिति द्वारा गहन जांच की संभावना। |
| समुदाय की राय | व्यापक परामर्श का दावा। | परामर्श के अभाव का आरोप। |


