सीजी भास्कर, 07 अप्रैल। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से मानवाधिकारों के उल्लंघन और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव की एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है, जो रूह कंपा देने (Minorities In Pakistan) वाली है। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के पेशावर में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर ईसाइयों के पास अपने प्रियजनों को दफनाने के लिए जमीन खत्म हो गई है। हालात इतने बदतर हैं कि नई लाशों को जगह देने के लिए पुरानी कब्रों को खोदा जा रहा है। ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ की एक रिपोर्ट ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की इस बेबसी को दुनिया के सामने रखा है।
कब्रिस्तान में जगह नहीं, माफिया का कब्जा (Minorities In Pakistan)
पेशावर के ऐतिहासिक कब्रिस्तान जैसे गोरा, वजीर बाग और कोहाटी अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा भर चुके हैं। स्थानीय नागरिक इमरान यूसुफ मसीह के मुताबिक, लोगों को मजबूरी में पुरानी कब्रों का दोबारा इस्तेमाल करना पड़ रहा है। कई बार तो एक ही कब्र में कई शवों को दफनाने की नौबत आ जाती है। रही-सही कसर जमीन माफिया ने पूरी कर दी है, जिन्होंने कब्रिस्तानों की जमीन पर अवैध कब्जे कर लिए हैं, जिससे अंतिम संस्कार के लिए जगह और भी कम हो गई है।
अपनों को खोने का दुख और फिर ‘बेअदबी’ का डर
सरकारी कर्मचारी जुल्फिकार मसीह ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, “हमें बराबरी का नागरिक कहा जाता है, लेकिन मरने के बाद एक सम्मानजनक विदाई तक नसीब (Minorities In Pakistan) नहीं है।” परिवारों के बीच इस बात को लेकर अक्सर विवाद होता है कि किसकी पुरानी कब्र को हटाकर नया शव दफनाया जाए। यह न केवल धार्मिक रूप से संवेदनशील है, बल्कि परिवारों के लिए मानसिक प्रताड़ना जैसा है।
सरकारी वादे कागजी, प्रतिनिधि शून्य
2023 की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी करीब 3.3% है। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की राज्य सरकार ने कई बार नए कब्रिस्तान के लिए जमीन और फंड का वादा किया, लेकिन हकीकत में कुछ नहीं बदला। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार अगर दूर-दराज के इलाकों में जमीन देती भी है, तो वहां सुरक्षा और पहुंच की बड़ी समस्या है। खैबर पख्तूनख्वा सरकार में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व न होने के कारण उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँच पा रही है।
हिंदू और सिख समुदाय भी प्रभावित
यह समस्या सिर्फ ईसाइयों तक सीमित नहीं है। पेशावर और आसपास के इलाकों में रहने वाले हिंदू और सिख समुदायों को भी श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों की कमी का सामना करना (Minorities In Pakistan) पड़ रहा है। फंड जारी होने के बावजूद जमीन पर कोई ठोस काम न होना सरकारी उदासीनता का प्रमाण है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए यह लड़ाई अब केवल जीवन के अधिकारों की नहीं, बल्कि मौत के बाद मिलने वाली ‘इज्जत’ की भी बन गई है।




