सीजी भास्कर, 21 मई : उत्तर बस्तर कांकेर के ऐतिहासिक गढ़िया पहाड़ में एक भालू शावक (Bear Rescue Kanker) के पत्थरों के बीच फंस जाने का एक बेहद दिलचस्प और भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है। करीब बीस घंटे तक यह मासूम शावक दर्दभरी आवाज में मदद के लिए चीखता रहा। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम भी मौके पर पहुंची, लेकिन पत्थरों की जटिल बनावट के कारण शावक तक पहुंचना संभव नहीं हो सका। आखिरकार जंगल के दूसरे भालुओं ने इंसानी मदद का इंतजार किए बिना खुद ही भारी-भरकम पत्थर हटाकर शावक को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
रातभर गूंजती रहीं शावक की चीखें
घटना (Bear Rescue Kanker) बीते दिनों की बताई जा रही है, जब राजापारा इलाके से लगे गढ़िया पहाड़ में कुछ भालू घूमते दिखाई दिए थे। देर रात पहाड़ के ऊपरी हिस्से से लगातार किसी जानवर के कराहने और चीखने की आवाज आने लगी। शुरुआत में नीचे रहने वाले लोगों ने इसे सामान्य वन्य जीवन की आवाज समझकर नजरअंदाज किया, लेकिन समय बीतने के साथ आवाजें और तेज होने लगीं, जिससे स्थानीय लोगों को किसी अनहोनी का शक हुआ।
अंधेरा होने और जंगली भालू के हमले के डर से रात में कोई भी स्थानीय नागरिक पहाड़ की तरफ जाने का साहस नहीं जुटा पाया। सुबह होते ही इस बात की सूचना तुरंत वन विभाग को दी गई। विभाग की रेस्क्यू टीम ने मौके पर पहुंचकर आधुनिक खोजी उपकरणों की मदद से शावक की सटीक स्थिति का पता लगाने की कोशिश की, लेकिन वह चट्टानों के काफी भीतर छिपा होने के कारण नजर नहीं आया। हालांकि, कुछ लोगों ने दूरबीन के माध्यम से फंसे हुए शावक को देखने का दावा किया।
भालुओं ने खुद दिखाई एकजुटता, हटाए पत्थर
अगले दिन सुबह से लेकर शाम तक कई भालुओं का उस विशिष्ट स्थान के आसपास लगातार आना-जाना लगा रहा, जहां शावक फंसा हुआ था। स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों और वहां तैनात सुरक्षा कर्मियों के अनुसार, रात के समय पत्थरों के आपस में टकराने और हटने जैसी तेज आवाजें आईं। इसके कुछ ही देर बाद शावक की दर्दभरी चीखें आना पूरी तरह बंद हो गईं।
वहां तैनात सुरक्षा कर्मी सुनील यादव ने बताया कि कुछ बड़े भालू लगातार उस जगह को घेरे हुए थे और मिट्टी खोद रहे थे। पूरी संभावना है कि भालुओं के समूह ने अपनी सामूहिक ताकत का उपयोग कर भारी पत्थरों को हटाया और शावक को सकुशल बाहर निकाल लिया। इस पूरी घटना को वन्य जीवों के बीच आपसी संवेदनशीलता, अपनत्व और एकता की एक बेजोड़ मिसाल माना जा रहा है।
वन विभाग ने दी सुरक्षात्मक कारणों की दलील
कांकेर (Bear Rescue Kanker) के वन परिक्षेत्र अधिकारी अमितेष परिहार ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि नियंत्रण कक्ष से सूचना मिलते ही वन अमला तुरंत हरकत में आ गया था। पहाड़ी इलाका होने के कारण आधुनिक खोजी कैमरों से भी खोजबीन की गई, लेकिन शावक चट्टानी दरारों के बहुत नीचे था। उन्होंने स्पष्ट किया कि भालू अपने प्राकृतिक आवास में थे, और ऐसी संवेदनशील स्थिति में वन्य जीवों के ज्यादा करीब जाने पर इंसानों पर जानलेवा हमला होने का गंभीर खतरा रहता है।
वन्य जीव विशेषज्ञों का भी मानना है कि मादा भालू अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर स्वभाव से बेहद आक्रामक और सुरक्षात्मक होती है। संकट में फंसे शावक को बचाने के लिए मां और उसके कुनबे ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी होगी, जिसके सुखद परिणाम स्वरूप मासूम शावक की जान बच सकी।



