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CG Hospital Negligence Case  : 1 यूनिट खून के लिए तड़पकर 20 साल की युवती ने तोड़ा दम, बिलखती मां की गुहार नहीं आई काम

By Newsdesk Admin
02/06/2026
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CG Hospital Negligence Case 
CG Hospital Negligence Case 

सीजी भास्कर, 02 जून : छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला अस्पताल से स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर देने वाली एक बेहद दर्दनाक और इंसानियत को झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। यहां महज एक यूनिट खून (ब्लड) समय पर न मिल पाने के कारण एक 20 वर्षीय गरीब और होनहार युवती की इलाज के दौरान तड़प-तड़प कर मौत हो गई। मृतिका के बेबस परिजनों का सीधा और संगीन आरोप है कि अस्पताल की घोर लापरवाही और संवेदनहीनता ने उनकी बेटी की जान ली है।

Contents
  • सिकल सेल एनीमिया की जंग में हार गई दीपिका
  • स्टाफ ने तड़पने के लिए छोड़ दिया
  • फेफड़ों में खाना फंसने की भी आशंका

घटना के समय मृतिका की लाचार मां अस्पताल के गलियारों में डॉक्टरों से लेकर ब्लड बैंक के कर्मचारियों के सामने अपनी बेटी की जिंदगी के लिए लगातार हाथ जोड़कर खून की गुहार लगाती रही, लेकिन किसी भी जिम्मेदार का दिल नहीं पसीजा। इस अमानवीय घटना के बाद से पूरे दुर्ग-भिलाई क्षेत्र में सरकारी अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ भारी आक्रोश देखा जा रहा है, जिसने प्रदेश में (CG Hospital Negligence Case) को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।

सिकल सेल एनीमिया की जंग में हार गई दीपिका

 

इस हृदयविदारक घटना का शिकार हुई मरोदा (भिलाई) की रहने वाली 20 वर्षीय दीपिका गाड़ा पिछले कई दिनों से गंभीर रूप से बीमार चल रही थी। उसके पूरे शरीर में असहनीय दर्द और अत्यधिक कमजोरी की शिकायत थी। जब शनिवार की रात उसकी तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई, तो घबराए परिजन उसे तत्काल इलाज के लिए दुर्ग जिला अस्पताल लेकर पहुंचे और वहां भर्ती कराया। अस्पताल में जरूरी प्राथमिक जांच के बाद डॉक्टरों ने परिजनों को बताया कि दीपिका के शरीर में खून की मात्रा बेहद खतरनाक स्तर तक कम हो चुकी है और उसे जिंदा रखने के लिए तत्काल (इमरजेंसी) ब्लड चढ़ाने की सख्त जरूरत है।

ड्यूटी डाक्टरों के मुताबिक, युवती जन्मजात ‘सिकल सेल एनीमिया’ (एक गंभीर अनुवांशिक रक्त विकार) नामक बीमारी से पीड़ित थी। उसका ब्लड ग्रुप ‘ओ पॉजिटिव’ था और उसके शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर गिरकर महज़ 5 ग्राम के आसपास पहुंच गया था, जो किसी भी इंसान के लिए बेहद क्रिटिकल स्थिति होती है। ऐसी नाजुक हालत में भी संवेदनहीन स्टाफ ने जो रवैया अपनाया, वह आज इस बड़े (CG Hospital Negligence Case) का मुख्य कारण बना हुआ है।

स्टाफ ने तड़पने के लिए छोड़ दिया

मृतिका दीपिका के शोकाकुल परिजनों ने अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि डॉक्टरों ने उन्हें तुरंत 3 यूनिट ब्लड की व्यवस्था करने का कड़ा फरमान सुना दिया था। चूंकि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है और वे बेहद गरीब तबके से आते हैं, इसलिए आधी रात को वे तुरंत किसी डोनर (रक्तदाता) का इंतजाम नहीं कर सके। मजबूरी और लाचारी के बीच, पीड़ित परिवार ने अस्पताल के ड्यूटी स्टाफ और सरकारी ब्लड बैंक के कर्मचारियों से हाथ जोड़कर मिन्नतें कीं कि कम से कम 1 यूनिट इमरजेंसी ब्लड बैंक के स्टॉक से दे दिया जाए, ताकि दीपिका का इलाज शुरू हो सके और उसकी जान बचाई जा सके।

दीपिका की माँ ने रोते हुए बताया कि उसने कई बार स्टाफ के सामने आंचल फैलाकर भीख मांगी, लेकिन नियमों का हवाला देकर उन्हें साफ मना कर दिया गया और खून उपलब्ध नहीं कराया गया। आखिरकार, बिना खून चढ़े, तड़पते हुए सोमवार की शाम इलाज के दौरान दीपिका ने दम तोड़ दिया। इस मौत के बाद आक्रोशित परिजनों ने मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषी डॉक्टरों पर कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर सिविल सर्जन कार्यालय का घेराव किया और एक कड़ा लिखित आवेदन सौंपा। बेटी को खोने के बाद बूढ़ी माँ और परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है।

 

फेफड़ों में खाना फंसने की भी आशंका

इस पूरे राजनैतिक और सामाजिक बवाल के बाद दुर्ग जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज मीडिया के सामने आए। उन्होंने पूरे मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कहा कि युवती की मौत केवल और केवल खून की कमी की वजह से ही हुई है, ऐसा दावा करना अभी बेहद जल्दबाजी होगी। उन्होंने डॉक्टरों की शुरुआती रिपोर्ट का हवाला देते हुए एक नई तकनीकी दलील पेश की:

“आईसीयू (ICU) के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने प्रारंभिक तौर पर ‘एस्पिरेशन’ (Aspiration) की गंभीर आशंका भी जताई है। एस्पिरेशन एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है जिसमें मरीज के उल्टी या भोजन का कोई अंश गलती से भोजन नली के बजाय सांस की नली के जरिए सीधे फेफड़ों में पहुंच जाता है, जिससे फेफड़े जाम हो जाते हैं और मरीज को सांस लेने में भारी दिक्कत होने लगती है।”

हालांकि, सिविल सर्जन डॉ. मिंज ने विभाग की गलती को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह जरूर माना कि अस्पताल के नियमों के मुताबिक, ऐसी किसी भी आपातकालीन या अत्यंत गंभीर स्थिति (Emergency Case) में मरीज की जान बचाने के लिए एक से दो यूनिट ब्लड बिना किसी डोनर के भी तुरंत उपलब्ध कराया जा सकता था और कराया जाना चाहिए था।

उन्होंने आगे कहा कि यदि यह पूरा मामला समय रहते सीधे उनके संज्ञान में लाया जाता, तो वे खुद अपने स्तर पर तुरंत ब्लड की व्यवस्था करवा देते। बहरहाल, अस्पताल प्रबंधन ने इस पूरे मामले की आंतरिक विभागीय जांच (Inquiry) शुरू कर दी है और अधिकारियों का कहना है कि शव की अंतिम पोस्टमार्टम (PM) रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक और वैज्ञानिक कारणों का पूरी तरह से खुलासा हो सकेगा। लेकिन तब तक, इस दर्दनाक (CG Hospital Negligence Case) ने गरीबों के लिए सरकारी अस्पतालों के दावों की पूरी कलई खोलकर रख दी है।

 

 

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