सीजी भास्कर, 06 फरवरी। Bilaspur High Court की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ राज्य चिकित्सा सेवा निगम लिमिटेड (CGMSC) के अधिकारियों की कार्यशैली पर तीखी नाराजगी (Chhattisgarh Tender Dispute) जताई है। सुनवाई के बाद रमेश सिन्हा और रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने CGMSC को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को क्षतिपूर्ति के रूप में एक लाख रुपये का भुगतान करे।
मामला जशपुर जिले के पत्थलगांव ब्लॉक में प्रस्तावित 50 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण कार्य से जुड़ा है। CGMSC ने 23 सितंबर 2025 को इस परियोजना के लिए ई-निविदा आमंत्रित की थी, जिसमें आंतरिक जल आपूर्ति, स्वच्छता फिटिंग और विद्युतीकरण कार्य भी शामिल थे। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 400.98 लाख रुपये निर्धारित की गई थी। निविदा प्रक्रिया 30 सितंबर से शुरू होकर 23 अक्टूबर 2025 को समाप्त हुई थी।
याचिकाकर्ता ने सभी शर्तों का पालन करते हुए 13 अक्टूबर 2025 को अपनी बोली जमा की थी। खास बात यह रही कि उसने अनुमानित लागत से 9.9 प्रतिशत कम दर प्रस्तुत की थी, जो राज्य सरकार के लिए सबसे किफायती प्रस्ताव था। इसके बावजूद उसकी वित्तीय बोली को न तो खोला गया और न ही उस पर विचार किया गया।
इस निर्णय को चुनौती देते हुए दुर्गा मेडिकल, घरघोड़ा (जिला रायगढ़) निवासी नटवर लाल अग्रवाल ने अपने अधिवक्ता आशुतोष मिश्रा के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका (Chhattisgarh Tender Dispute) दायर की। याचिका में कहा गया कि उसे बिना ठोस और स्पष्ट कारण के अयोग्य घोषित कर दिया गया, जबकि समान दस्तावेजों के आधार पर उसी विभाग की एक अन्य निविदा में उसकी बोली को वैध माना गया था।
बोली खोलने की प्रक्रिया पर सवाल
05 जनवरी 2026 को जब वित्तीय बोलियां खोली गईं, तो पोर्टल पर एक अन्य ठेकेदार को कम बोलीदाता दर्शाया गया, जबकि वास्तविक रूप से याचिकाकर्ता की दर उससे भी कम थी। बाद में ईमेल के माध्यम से यह बताया गया कि स्पष्टीकरण नहीं मिलने के कारण उसकी बोली अयोग्य कर दी गई, जिसे अदालत ने अस्पष्ट और भ्रामक आधार माना।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उसी दिन प्रस्तुत किए गए समान दस्तावेजों को दूसरी निविदा में स्वीकार कर लिया गया था, जिससे यह साफ होता है कि दस्तावेजों में कोई कमी नहीं थी। ऐसे में एक ही विभाग द्वारा अलग-अलग मापदंड अपनाना स्पष्ट रूप से मनमानी को दर्शाता है।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि सार्वजनिक निविदाओं में सबसे कम वैध बोली को दरकिनार करना निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और समान अवसर के सिद्धांतों (Chhattisgarh Tender Dispute) के विपरीत है। हालांकि, अदालत ने यह भी ध्यान रखा कि अनुबंध पहले ही दिया जा चुका है और कार्य प्रगति पर है, इसलिए जनहित में उसे रद्द करना उचित नहीं होगा।
इसी संतुलन के तहत अदालत ने CGMSC को याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया गया है कि चार सप्ताह के भीतर भुगतान नहीं होने पर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
यह फैसला न सिर्फ CGMSC, बल्कि सभी सरकारी एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि टेंडर प्रक्रिया में जरा सी भी लापरवाही या पक्षपात अब अदालत की नजर से नहीं बच पाएगा।




