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Home » Digital Surrender Policy : क्यूआर कोड बना माओवादियों की मुख्यधारा में वापसी का सेतु

Digital Surrender Policy : क्यूआर कोड बना माओवादियों की मुख्यधारा में वापसी का सेतु

By Newsdesk Admin
29/10/2025
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Digital Surrender Policy
Digital Surrender Policy

सीजी भास्कर, 29 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ में माओवादियों की आत्मसमर्पण (Digital Surrender Policy) प्रक्रिया अब बंदूक नहीं, डिजिटल संवाद के जरिए लिखी जा रही है। राज्य सरकार की नई रणनीति में क्यूआर कोड (QR Code) और गूगल फार्म (Google Form) ने नक्सलियों की मुख्यधारा में वापसी का रास्ता खोला है। पिछले दस दिनों में माओवादी संगठन के वरिष्ठ नेताओं भूपति और रूपेश उर्फ सतीश के नेतृत्व में 271 माओवादी, जबकि रविवार को कांकेर के अंतागढ़ क्षेत्र में 20 माओवादी, ऑनलाइन माध्यम से संपर्क करने के बाद आत्मसमर्पण कर चुके हैं।

Contents
  • डिजिटल तकनीक से ‘संवाद’ की नई शुरुआत
  • क्यूआर कोड से ‘सुरक्षित संवाद’
  • ‘डिजिटल संवाद’ से बदल रही रणनीति
  • विश्वास और तकनीक का संगम

डिजिटल तकनीक से ‘संवाद’ की नई शुरुआत

छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा ने बताया कि सरकार ने माओवादियों के पुनर्वास को मानवीय और व्यावहारिक बनाने के लिए (Digital Surrender Policy) के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया। माओवादियों से सीधे सुझाव और राय लेने के लिए गूगल फार्म, दो क्यूआर कोड और एक ईमेल आईडी जारी की गई थी।

सरकार को इन माध्यमों से दो हजार से अधिक सुझाव प्राप्त हुए, जिनमें कई नक्सलियों के सीधे संदेश शामिल थे। इन्हीं सुझावों के आधार पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छह माह पहले नई समर्पण एवं पुनर्वास नीति की घोषणा की थी। विजय शर्मा ने कहा “हमने माओवादियों से संवाद का रास्ता चुना। उन्होंने हिंसा छोड़ने की इच्छा जताई, हमने उन्हें विश्वास और सुरक्षा दी। परिणाम सबके सामने है।”

क्यूआर कोड से ‘सुरक्षित संवाद’

छत्तीसगढ़ गृह विभाग द्वारा जारी दो क्यूआर कोडों में से पहला गूगल फार्म से जुड़ा है, जबकि दूसरा पुनर्वास सहायता और संपर्क पेज पर ले जाता है। इन कोड्स को स्कैन करने पर HTTPS एन्क्रिप्टेड लिंक खुलता है, जिससे संवाद सुरक्षित और गोपनीय रहता है। फार्म भरने वाले व्यक्ति की पहचान गोपनीय रखी जाती है, जबकि जानकारी सीधे सरकारी सर्वर पर संरक्षित होती है। इसके बाद संबंधित अधिकारी ईमेल या वीडियो कॉल के माध्यम से संपर्क करते हैं। कई माओवादी नेताओं ने इन्हीं माध्यमों से पहली डिजिटल बातचीत की और फिर आत्मसमर्पण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

‘डिजिटल संवाद’ से बदल रही रणनीति

पहले माओवादियों के आत्मसमर्पण (Digital Surrender Policy) के लिए सिर्फ अपीलें की जाती थीं, लेकिन अब सरकार ने बातचीत का मंच भी उपलब्ध कराया है। इस रणनीति ने आत्मसमर्पण की प्रक्रिया को न केवल सरल बनाया बल्कि नक्सलियों के भीतर विश्वास भी जगाया।

रूपेश जैसे शीर्ष माओवादियों ने वीडियो कॉल पर अपनी शर्तें और आशंकाएं रखीं, जिन्हें सरकार ने मानवीय दृष्टिकोण से हल किया। अब राज्य की नीति सिर्फ ऑपरेशन नहीं, संवाद और पुनर्वास के संतुलन पर आधारित है।

विश्वास और तकनीक का संगम

छत्तीसगढ़ मॉडल ने यह दिखाया है कि तकनीक और विश्वास मिलकर सामाजिक बदलाव का माध्यम बन सकते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने नक्सलियों को यह भरोसा दिया कि सरकार से संपर्क करने पर उनका डेटा और पहचान सुरक्षित रहेगी। इस रणनीति ने यह साबित कर दिया कि बदलाव की शुरुआत अब बंदूक नहीं, स्क्रीन से होती है।

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