Chhattisgarh High Court ने एक महत्वपूर्ण मामले में लगभग दो दशक पुराने वैवाहिक विवाद का अंत करते हुए पति-पत्नी को आपसी सहमति से अलग होने की अनुमति दे दी है। अदालत ने यह माना कि जब रिश्ते में सुलह की संभावनाएं लगभग खत्म हो चुकी हों और दोनों पक्ष लंबे समय से अलग रह रहे हों, तब विवाद को लंबा खींचने से केवल मानसिक तनाव ही बढ़ता है। इसी आधार पर अदालत ने Divorce Settlement Chhattisgarh मामले में तलाक को मंजूरी देते हुए समझौते की शर्तों को स्वीकार किया।
मध्यस्थता केंद्र में बनी सहमति, तय हुआ एलिमनी का भुगतान
डिवीजन बेंच, जिसमें Justice Sanjay K. Agrawal और Justice Arvind Kumar Verma शामिल थे, ने मामले को पहले मध्यस्थता केंद्र भेजा था। यहां दोनों पक्षों के बीच लंबी चर्चा के बाद समझौता तैयार हुआ। समझौते के मुताबिक पति ने पत्नी को कुल 51 लाख रुपये गुजारा भत्ता देने पर सहमति जताई। यह राशि अलग-अलग किस्तों में डिमांड ड्राफ्ट के जरिए दी गई। इस पूरे समझौते को अदालत ने (Mutual Divorce Agreement) के रूप में दर्ज किया और अंतिम आदेश पारित किया।
बेटियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए 30 लाख की एफडी
समझौते का एक अहम हिस्सा बच्चों के भविष्य से भी जुड़ा रहा। पति ने अपनी दोनों बेटियों के नाम पर 15-15 लाख रुपये की दो फिक्स्ड डिपॉजिट कराने का निर्णय लिया, ताकि उनके शिक्षा और भविष्य की जरूरतों में आर्थिक सुरक्षा बनी रहे। अदालत ने भी इस व्यवस्था को उचित मानते हुए कहा कि (Child Future Security) को ध्यान में रखकर किया गया यह प्रावधान बच्चों के हित में है।
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
इससे पहले फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आरोप को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में खारिज कर दिया था। बाद में मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर का उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि यदि पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों और पुनर्मिलन की कोई संभावना न हो, तो छह महीने का अनिवार्य कूलिंग पीरियड समाप्त किया जा सकता है। इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने (Cooling Period Waiver) लागू करते हुए आपसी सहमति से तलाक की डिक्री जारी करने का आदेश दिया।





