सीजी भास्कर, 17 जून। 55 करोड़ रुपए की बहुचर्चित परिक्रमा पथ फोरलेन परियोजना अब केवल विकास का विषय नहीं रह गई है, बल्कि पारदर्शिता, भूमि चयन और सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर बड़े सवालों के घेरे में आ गई है। दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही इस परियोजना को लेकर सवाल उठने शुरू हुए, जिला प्रशासन की ओर से परियोजना के फायदे गिनाते हुए लगातार प्रेस विज्ञप्तियां जारी की जाने लगीं, लेकिन दूसरी ओर प्रभावित किसान अब भी यह जानने के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि आखिर उनकी जमीन ही क्यों चुनी गई। (Dongargarh Parikrama Path Project)
किसान फहीम अख्तर सहित कई प्रभावित भू-स्वामियों ने आरोप लगाया है कि उन्होंने समय-सीमा के भीतर आपत्तियां दर्ज कराईं, लेकिन उनकी आपत्तियों पर स्पष्ट और कारणयुक्त निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया। अब मामला कलेक्टर कार्यालय से आगे बढ़कर दुर्ग संभाग आयुक्त तक पहुंच गया है, जहां स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है।
परियोजना की प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल : Dongargarh Parikrama Path Project
विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि प्रशासन स्वयं स्वीकार कर चुका है कि प्रस्तावित 8 किलोमीटर मार्ग में लगभग 4.475 किलोमीटर हिस्सा शासकीय भूमि पर निर्मित होगा, जबकि शेष हिस्से के लिए निजी भूमि ली जाएगी। किसानों का सवाल है कि यदि सरकारी भूमि पहले से उपलब्ध है तो वैकल्पिक मार्गों का तकनीकी परीक्षण सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और यदि किया गया है तो उसकी रिपोर्ट सामने क्यों नहीं रखी जा रही? किसानों की शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि उन्हें स्वीकृत नक्शा, अंतिम अलाइनमेंट, तकनीकी प्रतिवेदन और भूमि चयन का आधार उपलब्ध नहीं कराया गया। यही वजह है कि अब परियोजना की आवश्यकता से अधिक उसकी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
सवालों और अधिकारियों की चुप्पी से संदेह
यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अभी तक किसी सक्षम जांच एजेंसी या न्यायिक मंच ने भ्रष्टाचार, भू-माफिया की संलिप्तता अथवा अनियमितता की पुष्टि नहीं की है, लेकिन प्रभावित किसानों द्वारा बार-बार उठाए जा रहे सवालों और अधिकारियों की चुप्पी ने संदेहों को और मजबूत किया है। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि परियोजना पूरी तरह जनहित में है तो उसकी डीपीआर, अंतिम रूट मैप, वैकल्पिक मार्गों का अध्ययन और भूमि चयन के तकनीकी आधार सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों है? विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता जितनी अधिक होगी, विवाद उतने ही कम होंगे।
स्वतंत्र तकनीकी और प्रशासनिक जांच में सामने आएगी सच्चाई : Dongargarh Parikrama Path Project
डोंगरगढ़ जैसे धार्मिक नगर में करोड़ों रुपये की परियोजना पर उठे सवालों का समाधान केवल प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं, बल्कि दस्तावेजी पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच से ही संभव है। क्योंकि यह मामला अब केवल सड़क निर्माण का नहीं, बल्कि किसानों के अधिकार, सरकारी धन और प्रशासनिक जवाबदेही का भी बन चुका है। फिलहाल निष्कर्ष यही है कि प्रशासन परियोजना को विकास का मॉडल बता रहा है, जबकि प्रभावित किसान इसे जांच का विषय मान रहे हैं। सच क्या है, इसका जवाब केवल स्वतंत्र तकनीकी और प्रशासनिक जांच ही दे सकती है।





