सीजी भास्कर, 19 जून : छत्तीसगढ़ के चिकित्सा और स्वास्थ्य हलकों में इन दिनों एक नए सरकारी आदेश (CGMC Registration Controversy) को लेकर जबरदस्त घमासान और विरोध की स्थिति निर्मित हो गई है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग और छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल (CGMC) द्वारा महज 15 दिनों के भीतर जारी किए गए दो अलग-अलग अधिसूचनाओं (नोटिफिकेशन) ने स्थानीय डॉक्टरों और जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (जूडा) को आंदोलन की राह पर ला खड़ा किया है। नए नियमों के मुताबिक, अब दूसरे राज्यों के एलोपैथिक डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ बिना छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल में अतिरिक्त पंजीयन या अनुमति के भी यहां के अस्पतालों में प्रैक्टिस कर सकेंगे। इस फैसले का विरोध कर रहे स्थानीय डॉक्टरों का कहना है कि इससे प्रदेश में फर्जी डॉक्टरों की बाढ़ आ जाएगी और स्थानीय मेडिकल छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।
15 दिनों के भीतर आए दो नोटिफिकेशन ने उलझाया पूरा मामला
विवाद की मुख्य वजह स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल काउंसिल के नियमों में विरोधाभास होना है। इसे क्रोनोलॉजिकल तरीके से ऐसे समझा जा सकता है:
पहला नोटिफिकेशन (27 मई): सबसे पहले छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल (CGMC) ने एक आदेश जारी किया। इसमें कहा गया कि दूसरे राज्यों में रजिस्टर्ड एलोपैथिक चिकित्सकों (MBBS, MD, MS, DNB, DM, MCH) को छत्तीसगढ़ में प्रैक्टिस करने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन काउंसिल की शर्त होगी कि संबंधित डॉक्टर को अपने मूल राज्य का रजिस्ट्रेशन और सभी जरूरी दस्तावेज CGMC में जमा करने होंगे। काउंसिल द्वारा दस्तावेजों की पूरी जांच (Verification) के बाद ही उन्हें बकायदा अनुमति पत्र जारी किया जाएगा।
दूसरा नोटिफिकेशन (11 जून): काउंसिल के इस आदेश के ठीक 15 दिन बाद छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने एक नया नोटिफिकेशन जारी कर दिया, जिसने पहले वाले आदेश को पूरी तरह ‘सुपरसीड’ (अतिरोहित) कर दिया। इस नए आदेश में साफ कहा गया कि दूसरे राज्यों में पंजीकृत डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को छत्तीसगढ़ में सेवाएं देने के लिए अब किसी भी अतिरिक्त स्थानीय अनुमति या वेरिफिकेशन की जरूरत नहीं होगी। वे सीधे यहाँ काम शुरू कर सकते हैं।
जूडा और डॉक्टर्स फेडरेशन का कड़ा विरोध; गिनाईं ये 3 बड़ी खामियां
काउंसिल के पहले आदेश और फिर सरकार के दूसरे फैसले का जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (JUDA) और छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडरेशन मिलकर पुरजोर विरोध कर रहे हैं। डॉक्टरों के संगठनों ने इस नीति के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी देते हुए निम्नलिखित चिंताएं जाहिर की हैं:
फर्जीवाड़े की भारी आशंका: डॉक्टरों का कहना है कि बिना स्थानीय स्क्रूटनी और दस्तावेजों की जांच के यदि किसी को भी प्रैक्टिस की छूट मिलेगी, तो दूसरे राज्यों से फर्जी डिग्रीधारी (झोलाछाप) या दागी डॉक्टर भी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और शहरी इलाकों के अस्पतालों में पैर पसार लेंगे। यह सीधे तौर पर मरीजों की जान और स्वास्थ्य के साथ बड़ा खिलवाड़ होगा।
स्थानीय स्तर पर रोजगार का संकट: छत्तीसगढ़ के मेडिकल कॉलेजों से हर साल सैकड़ों छात्र एमबीबीएस और पीजी करके निकल रहे हैं। यदि बाहरी राज्यों के डॉक्टरों को बिना किसी रोक-टोक के खुली छूट मिलेगी, तो स्थानीय युवाओं के सामने गंभीर बेरोजगारी और करियर का संकट खड़ा हो जाएगा।
जवाबदेही का अभाव: यदि कोई बाहरी डॉक्टर किसी मरीज के इलाज में गंभीर लापरवाही बरतता है या कोई हादसा होता है, तो छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल उस पर सीधे अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर पाएगी, क्योंकि वह यहां रजिस्टर्ड ही नहीं होगा।
सरकार का तर्क: दूरस्थ अंचलों में स्वास्थ्य व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए कदम जरूरी
दूसरी ओर, इस पूरे विवाद पर राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने अपना रुख स्पष्ट किया है। सरकार का तर्क है कि बस्तर, सरगुजा और अन्य दूरस्थ वनांचलों के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, विशेषज्ञ सर्जनों और क्वालिफाइड नर्सों की भारी कमी है। इस कमी को तत्काल दूर करने और राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं को पटरी पर लाने के लिए अस्थाई तौर पर यह सुगम व्यवस्था बनाई गई है।
शासन के आला अधिकारियों ने स्थानीय जूनियर डॉक्टरों को आश्वस्त करते हुए स्पष्ट किया है कि इस नीति से छत्तीसगढ़ के स्थानीय डॉक्टरों के नियमित पदों, सरकारी भर्तियों या उनके भविष्य पर किसी भी तरह का कोई संकट नहीं आएगा, बल्कि इससे स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा। हालांकि, डॉक्टरों का संगठन इस आश्वासन से संतुष्ट नहीं है और आदेश वापस लेने की मांग पर अड़ा है।





