सीजी भास्कर, 26 अप्रैल : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विवाहित पुरुषों और महिलाओं के आपसी संबंधों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय एस. अग्रवाल की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला यह जानते हुए कि पुरुष पहले से ही विवाहित है, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती है, तो बाद में वह उस पर शादी का झांसा देकर धोखाधड़ी या शोषण का आरोप नहीं लगा सकती। इस टिप्पणी (High Court Landmark Judgment) के साथ ही माननीय न्यायालय ने महिला की अपील को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया और निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को यथावत रखा।
खुद की पैरवी और दावों में उलझी महिला
इस संवेदनशील मामले की एक खास बात यह रही कि हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान महिला ने किसी वकील के बजाय स्वयं अपनी पैरवी की। डोंगरगढ़ निवासी इस महिला का आरोप था कि उसका विवाह 8 मई 2008 को महेश गंजीर नामक व्यक्ति के साथ हुआ था और जनवरी 2009 में एक इकरारनामा भी बनाया गया था। महिला का दावा था कि वे लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहे और इस दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध बने। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसने विभिन्न यात्राओं पर 85 हजार रुपये खर्च किए, लेकिन जब उसने और पैसे देने से मना किया, तो उसे घर से निकाल दिया गया। इसी आधार पर महिला ने इसे धोखाधड़ी (High Court Landmark Judgment) करार दिया था।
विरोधाभासों ने खोली पोल, शादी के सबूत नहीं
जब मामला गहराई से जांचा गया, तो ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने पाया कि महिला के बयानों में भारी विरोधाभास था। रिकॉर्ड के मुताबिक, महिला द्वारा पूर्व में दिए गए कानूनी नोटिस और पुलिस शिकायत में शादी की किसी निश्चित तारीख का कोई उल्लेख नहीं था। शिकायत में केवल यह कहा गया था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर मई से सितंबर 2008 के बीच संबंध बनाए। कोर्ट ने गौर किया कि महिला के एक पुराने नोटिस से यह साफ झलकता है कि उसे पहले से ही पता था कि महेश शादीशुदा है। यहां तक कि उसे महेश की पहली पत्नी का नाम तक मालूम था। इस तथ्य (High Court Landmark Judgment) ने महिला के ‘धोखे’ वाले दावे की बुनियाद ही हिला दी।
कानून की नजर में सहमति और जानकारी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह रेखांकित किया कि जब एक बालिग महिला किसी विवाहित पुरुष की वैवाहिक स्थिति से अवगत होने के बावजूद अपनी मर्जी से संबंध बनाती है, तो उसे कानूनी रूप से ‘शादी का झांसा’ नहीं माना जा सकता। विवाह का कोई ठोस प्रमाण न होने और महिला की पूर्व जानकारी के आधार पर अदालत ने आरोपी महेश को निर्दोष माना। कानून के जानकारों का मानना है कि यह फैसला (High Court Landmark Judgment) भविष्य में इस तरह के ब्लैकमेलिंग या गलत आरोपों के मामलों को रोकने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा।


