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Home » सुसाइड केस में हाईकोर्ट का अहम फैसला: पति-ससुर बरी, गुस्से में कहे शब्द उकसावे के दायरे में नहीं

सुसाइड केस में हाईकोर्ट का अहम फैसला: पति-ससुर बरी, गुस्से में कहे शब्द उकसावे के दायरे में नहीं

By Newsdesk Admin
06/07/2025
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सीजी भास्कर, 6 जुलाई |

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहू के सुसाइड मामले में पति और ससुर को दोषमुक्त किया है। हाईकोर्ट ने कहा कि ससुराल में बहू पर टिप्पणी करना आत्महत्या के लिए उकसाने का पर्याप्त आधार नहीं है। वहीं, लोअर कोर्ट ने दोनों को 7 साल के सश्रम कारावास और 1 हजार जुर्माने की सजा सुनाई थी।

घटना 13 साल पहले की है, जब एक महिला ने केरोसिन डालकर खुद को आग के हवाले कर दिया था। मौत से पहले अपने बयान में महिला ने कहा था कि ससुराल वालों की टिप्पणी और अपशब्द से आहत होकर उसने ये कदम उठाया है। इसके आधार पर पति और ससुर को सजा सुनाई गई थी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि तिरस्कारपूर्ण टिप्पणियां यदि मानी भी जाएं तो वे इतनी गंभीर नहीं थीं कि मृतका के पास आत्महत्या के अलावा और कोई उपाय नहीं था। ‘गुस्से में कहे गए शब्द, सुसाइड के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता’

जानिए क्या है पूरा मामला

31 दिसंबर 2013 को रायपुर स्थित अस्पताल में एक झुलसी हुई महिला को भर्ती कराया गया था। 5 जनवरी 2014 को उसकी मौत हो गई। महिला ने मौत से पहले कार्यपालक मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया था।

आरोप के मुताबिक महिला के पति और ससुर उसे अपशब्द कहकर अपमानित करते थे और चरित्र पर शंका करते थे। ससुराल वालों की तिरस्कारपूर्ण भाषा के कारण उसने खुद पर केरोसिन डालकर आग लगाई है।

महिला के परिजनों ने लगाया था प्रताड़ना का आरोप

मृतका के माता-पिता और भाई ने भी अपने बयानों में बताया कि पति-पत्नी के बीच अक्सर झगड़े होते थे और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था।

अपीलकर्ताओं की ओर से हाईकोर्ट में तर्क दिया कि घटना से ठीक पहले किसी भी प्रकार की तुरंत उकसाने वाली या उत्प्रेरक बात नहीं हुई थी, जो आत्महत्या के लिए कानूनी रूप से जरूरी मानी जाती है।

आत्महत्या के लिए जरूरी दुष्प्रेरण (उकसाना) नहीं हुआ सिद्ध

अभियोजन पक्ष आत्महत्या के लिए जरूरी दुष्प्रेरण (उकसाना) सिद्ध नहीं कर पाया। शासन की ओर से वकील ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, जिससे यह साबित होता है कि आरोपियों ने मृतका को प्रताड़ित किया और उसे आत्महत्या के लिए विवश किया।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने धारा 306 आईपीसी की व्याख्या करते हुए कहा कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (उकसाना) सिद्ध करने यह प्रमाणित करना होता है कि आरोपी ने उकसाया, षड्यंत्र किया, या जानबूझकर मजबूर किया।

‘गुस्से में कहे गए शब्द, सुसाइड के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता’

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘शादी को 12 साल हो चुके थे, इसलिए धारा 113 ए के तहत 7 सालों के अंदर आत्महत्या पर लागू होने वाला विधिक अनुमान इस मामले में नहीं लगाया जा सकता। क्रोध या भावावेश में कहे गए शब्द, यदि उनकी मंशा ऐसी नहीं हो, तो उन्हें आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता।’

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