सीजी भास्कर 5 दिसंबर भारत और रूस के रिश्तों की नई दिशा तय करने वाली यह मुलाकात ऐसे माहौल में हो रही है, जब भारत पर अमेरिका की ओर से लगाए गए 25+25 प्रतिशत टैरिफ ने ट्रेड बैलेंस में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिका के आरोप—कि भारत की रूसी तेल खरीद यूक्रेन संघर्ष को फंड करती है—को भारत ने पहले ही खारिज कर दिया था। इसी पृष्ठभूमि में पुतिन का भारत का ये दौरा न सिर्फ कूटनीतिक, बल्कि India-Russia Strategic Talks का निर्णायक बिंदु माना जा रहा है।
2021 के बाद पहली मुलाकात, पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच नई धुरी का इशारा
यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी देशों की तरफ़ से रूस पर लगाए गए भारी प्रतिबंधों के कारण मॉस्को नई आर्थिक धुरी खोज रहा है। ऐसे में भारत—जिसने अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को देखते हुए रूस से लगातार खरीदारी जारी रखी—रूस के लिए स्थिर बाज़ार साबित हुआ है। इस दौर में दोनों देशों का 100 बिलियन डॉलर ट्रेड टार्गेट, आर्थिक साझेदारी की बड़ी तस्वीर को और स्पष्ट करता है।
डिफेंस सहयोग में Su-57 जॉइंट प्रोडक्शन सबसे बड़ा एजेंडा
रक्षा सेक्टर में इस बार सबसे ज्यादा चर्चा सुखोई Su-57 के जॉइंट प्रोडक्शन की है, जिसे भारत की रणनीतिक क्षमता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रूस की संसद के निचले सदन द्वारा मिलिट्री सहयोग समझौते को मंज़ूरी मिलने के बाद दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे की जमीन पर कानूनी रूप से सैनिक और सैन्य उपकरण तैनात करने की अनुमति भी मिलेगी—जो strategic deployment का बड़ा संकेत है।
‘मेक इन इंडिया’ में रूस की बड़ी एंट्री, तकनीक ट्रांसफर पर जोर
भारत ने रूस समेत मित्र देशों से आग्रह किया है कि वे देश की रक्षा कंपनियों के साथ मिलकर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर आधारित उत्पादन करें। रूस के राजदूत की ओर से Su-57 पर बातचीत की पुष्टि के बाद यह तय माना जा रहा है कि दोनों देश वायु, नौसेना और मिसाइल प्लेटफॉर्म्स पर गहरे सहयोग की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
अंतरिक्ष सहयोग का नया अध्याय—ह्यूमन स्पेसफ्लाइट से लेकर इंजन निर्माण तक
अंतरिक्ष अनुसंधान में भारत और रूस की साझेदारी कई दशक पुरानी है। इस बार India-Russia Strategic Talks के तहत जो ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है, उसमें इंजन निर्माण, फ्यूल डेवलपमेंट, मानवयुक्त उड़ानों में सहयोग और भविष्य के नेशनल ऑर्बिटल स्टेशन की दिशा में संयुक्त प्रयास शामिल होंगे। रोस्कोस्मोस प्रमुख के अनुसार, रूस भारत के साथ इन सभी प्रोजेक्ट्स में दीर्घकालिक भागीदारी के लिए तैयार है।
ऐतिहासिक रिश्ता, नए समय की जरूरतों के साथ फिर मज़बूत
1960 के दशक से चली आ रही अंतरिक्ष साझेदारी, 1984 में राकेश शर्मा की ऐतिहासिक सोयुज उड़ान और अब गगनयान तक की यात्रा—यह सब भारत-रूस के निरंतर भरोसे को दिखाता है। आज की मुलाकात में इसी भरोसे को ऊर्जा, रक्षा, वाणिज्य और रणनीतिक संतुलन के नए अध्याय में बदलने की कोशिश है।
हैदराबाद हाउस से निकलने वाले फैसले न सिर्फ मॉस्को और नई दिल्ली, बल्कि वाशिंगटन तक असर डालेंगे—और यही वजह है कि यह मुलाकात वैश्विक शक्ति समीकरण में एक बड़ा मोड़ बन सकती है।





