सीजी भास्कर 1 मार्च बिलासपुर में स्थित छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने किशोर न्याय से जुड़े एक संवेदनशील मामले में निचली अदालतों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने साफ कहा कि जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा 12 में जमानत को लेकर जो दिशा-निर्देश दिए गए हैं, उनकी अनदेखी करना कानूनन सही नहीं है। कोर्ट का यह रुख (Juvenile Justice Act Bail) मामलों में एक अहम मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है।
खड़गवां थाना क्षेत्र से जुड़ा है पूरा मामला
मामला थाना खड़गवां, जिला मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर से जुड़ा हुआ है। अभियोजन के मुताबिक, एक नाबालिग पीड़िता (लगभग 14–15 वर्ष) के गर्भवती पाए जाने के बाद मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने कार्रवाई शुरू की। पीड़िता के कथन पर नाबालिग आरोपी (लगभग 16–17 वर्ष) के खिलाफ बीएनएस की धाराओं और पॉक्सो कानून के तहत केस दर्ज किया गया। इस पूरे घटनाक्रम को अदालत ने (Juvenile Justice Act Bail) के कानूनी फ्रेमवर्क में परखने की बात कही।
आरोपों की प्रकृति और अभियोजन का पक्ष
अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर पीड़िता को अपने साथ रखा और कथित रूप से कई बार शारीरिक संबंध बनाए, जिससे पीड़िता गर्भवती हुई। गंभीर आरोपों को देखते हुए निचली अदालत ने पहले जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि नाबालिग आरोपी के मामले में (Juvenile Justice Act Bail) से जुड़े प्रावधानों का पालन अनिवार्य है, भले ही आरोप कितने ही गंभीर क्यों न हों।
बचाव पक्ष की दलीलें, जिन पर कोर्ट ने ध्यान दिया
बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह रखा कि आरोपी खुद नाबालिग है, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वह 7 जून 2025 से ऑब्जर्वेशन होम में रह रहा है। सामाजिक स्थिति रिपोर्ट भी आरोपी के पक्ष में है, जिससे यह संकेत मिलता है कि जमानत मिलने पर उसके अपराधी तत्वों के संपर्क में आने की आशंका नहीं है। इन पहलुओं को देखते हुए कोर्ट ने (Juvenile Justice Act Bail) के सिद्धांतों को लागू करने पर जोर दिया।
राज्य और पीड़िता की राय ने बदला रुख
राज्य शासन ने अपराध की गंभीरता का हवाला देकर जमानत का विरोध किया, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और सामाजिक स्थिति रिपोर्ट अनुकूल है। सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसकी मां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुईं और उन्होंने जमानत पर आपत्ति नहीं जताई। इस बिंदु ने भी (Juvenile Justice Act Bail) के संदर्भ में अदालत के निर्णय को प्रभावित किया।
निचली अदालतों को हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश
अदालत ने अपने आदेश में यह संदेश दिया कि किशोर न्याय से जुड़े मामलों में कानून की मूल भावना—पुनर्वास और सुधार—को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर जमानत खारिज करना सही तरीका नहीं है। इस फैसले को (Juvenile Justice Act Bail) से जुड़े भविष्य के मामलों में मार्गदर्शक माना जा रहा है।






